डॉ. महेन्द्र यादव की पाती थोड़ी जज्बाती

कला और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं होता कि समाज की नैतिकता और मूल्यों की धज्जियाँ उड़ा दी जाएँ। कॉमेडी का उद्देश्य हँसाना होता है, लेकिन जब हास्य अश्लीलता, फूहड़ता और अपसंस्कृति का पर्याय बन जाए, तो यह समाज के मानसिक और सांस्कृतिक पतन का संकेत है।
आजकल की स्टैंड-अप कॉमेडी में यह प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। रणवीर अहलाबादिया जैसे लोग कॉमेडी की आड़ में अभद्र भाषा, दोहरे अर्थों वाले संवाद, और समाज के मूल्यों की खिल्ली उड़ाने को ही मज़ाक समझ बैठे हैं। यही नहीं, समय रैना जैसे कलाकार अपने शो इंडियाज गॉट लेटेंट के माध्यम से युवाओं के बीच एक ऐसी सोच विकसित कर रहे हैं, जो भारतीय संस्कृति और सभ्यता को विकृत करने का प्रयास करती है।
क्या यही नई पीढ़ी को सिखाया जाएगा?
भारत की हास्य परंपरा बहुत समृद्ध रही है। एक समय था जब शरद जोशी, हरिशंकर परसाई,काका हाथरसी ,हरिशंकर परसाई, श्रीलाल शुक्ल, अविनाश वाचस्पति, डॉ.शिव शर्मा,अशोक चक्रधर, के पी सक्सेना, गिरीश पंकज, नरेन्द्र कोहली, रवीन्द्र प्रभात,हुल्लड़ मुरादाबादी, ज्ञान चतुर्वेदी
जैसे व्यंग्यकारों के शब्दों में गहरी सामाजिक चेतना होती थी। वे समाज को न केवल हँसाते थे, बल्कि सोचने पर भी मजबूर करते थे। लेकिन आज की नई पीढ़ी को कौन-सा हास्य सिखाया जा रहा है?
इंडियाज गॉट लेटेंट जैसे शो में ऐसा क्या “प्रतिभाशाली” हो रहा है, जो नई पीढ़ी के लिए अनुकरणीय हो? यहाँ कॉमेडी के नाम पर केवल गालियाँ, द्विअर्थी संवाद और फूहड़ता परोसी जा रही है। युवाओं को बताया जा रहा है कि हँसाने के लिए नैतिकता की हत्या करना कोई बुरी बात नहीं है। क्या यह हास्य के नाम पर समाज के मानसिक स्तर को गिराने की साजिश नहीं है?
हास्य और अश्लीलता में अंतर समझना होगा
कॉमेडी समाज को राहत देने का माध्यम है, न कि मानसिक प्रदूषण फैलाने का। हास्य और अश्लीलता में बहुत बड़ा अंतर होता है। एक स्वस्थ हास्य दिल को सुकून देता है, रिश्तों को मजबूत करता है, और मानसिक तनाव कम करता है। वहीं, अश्लीलता केवल तात्कालिक उत्तेजना और सस्ती लोकप्रियता का जरिया बनती है।
रणवीर अहलाबादिया जैसे कथित कॉमेडियंस अश्लीलता को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता समझते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि हास्य की भी एक गरिमा होती है। जब हास्य, गाली-गलौज और नग्न संवादों पर आधारित होने लगे, तो वह समाज पर कुठाराघात बन जाता है।
समाज को अब निर्णय लेना होगा
यह समय जागने का है। हमें यह तय करना होगा कि हम अपने बच्चों को किस तरह की कॉमेडी दिखाना चाहते हैं। क्या हम चाहते हैं कि हमारी आने वाली पीढ़ी सभ्य हास्य को अपनाए, या फिर गाली-गलौज, फूहड़ता और मानसिक दिवालियापन को मनोरंजन समझे?
हमें ऐसे शो और कलाकारों का बहिष्कार करना होगा जो कॉमेडी के नाम पर सभ्यता को रौंद रहे हैं। हमें स्वस्थ हास्य को बढ़ावा देना होगा, ताकि कॉमेडी वास्तव में एक सशक्त कला के रूप में जीवित रह सके, न कि सांस्कृतिक पतन के औजार के रूप में।
