मोहन सिंह 2 अक्टूबर 18 69 को पैदा हुए महात्मा गांधी का जन्म दिवस हर साल अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में मनाया जाता है। मोहन दास करमचंद गांधी का भविष्य में महात्मा गांधी बनने की कहानी दरअसल दक्षिण अफ्रीका में उनके सत्याग्रह आंदोलन की सफलता के बाद ही शुरू होती है। 24 वर्ष की अवस्था में वे अब्दुल्ला एंड अब्दुल्ला कम्पनी के बुलावे पर एक मुकदमे की पैरवी के सिलसिले में दक्षिण अफ्रीका की यात्रा पर जाते हैं। ट्रेन से वे फर्स्ट क्लास के टिकट पर डरबन से प्रिटोरिया की यात्रा कर रहे थे। एक गोरे अंग्रेज की शिकायत पर कि- यह काले रंग का आदमी एक अंग्रेज के डिब्बे में साथ-साथ यात्रा कैसे कर सकता है? मोहनदास करमचंद गांधी को पीटरमारिट्जवर्ग रेलवे स्टेशन पर सामान समेत बाहर निकाल दिया गया। गांधी को दरअसल पता ही नहीं था कि रंगभेद के आधार पर भेदभाव की जड़े दक्षिण अफ्रीका में इतनी गहरी है। पहले तो गांधी ने बैध टिकट का हवाला देते हुए ट्रेन से उतरने से मना कर दिया।बाद में रेलवे कर्मचारियों ने गार्ड की मदद से उनका सारा सामान बाहर फिंकवा दिया और गांधी को धक्का देकर बाहर कर दिया गया। 7 जून 1893 को जाड़े की वह कड़कड़ाती रात्रि दरअसल मोहनदास करमचंद गांधी के जीवन की दिशा बदलने में निर्णायक साबित होने वाली थी। पीटरमारिट्जवर्ग के उस ‘वेटिंगरूम’ करमचंद्र गांधी को तय करना था कि इस व्यक्तिगत अपमान की घटना को भूल जाए? जैसे कुछ हुआ ही नहीं? इतनी सी बात है, आई -गई और हो गयी? इस मानसिक द्वंद्व से उन्हें उबरना था।अपने निजी अपमान की घटना को अंग्रेजों द्वारा रोज-रोज तिरस्कार -अपमान और घृणा झेल रहे व्यापक भारतीय समुदाय और एशियाई मूल के सरोकारों से जोडना था। निजी तौर अपने भोगे हुए सच को साझा करना था। यह कि – दुःख सबको मांजता है और- चाहे स्वयं सबको मुक्ति देना वह न जाने, किन्तु – जिन्हें मांजता है, उन्हें सीख देता है की सबको मुक्त रखें।।( अज्ञेय )। ऐसी ही घड़ी में दुःख का असली स्वरूप भी सामने आता है, और कुछ कर गुजरने के लिए संकल्प लेने के लिए भी प्रेरित करता है। गांधी को जल्द ही अब इस मानसिक द्वंद्व से उबरना था। संकल्प लेकर आगे बढ़ना था।आगे इस संकल्प को व्यापक और सर्व कल्याणकारी बनाना है-यह भी अभी तय हो जाना है। ‘तन मे मन: शिव संकल्प मस्तु ‘ (यजुर्वेद)को सिद्ध करना है। फैसला तो इस रात ही करना है, सुबह होते कहीं देर न हो जाए। कौन जाने तब तक शायद विचार ही बदल जाए। करमचंद्र गांधी के साहस और धैर्य की परीक्षा यहां से शुरू होती है।क्यों कि साहस कब पूछता है कि- पहाड़ की ऊंचाई कितनी है? मोहन दास करमचंद गांधी को भी पता है कि ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार इतना और ताकतवर इतनी कि उसके राज में कभी सूर्यास्त नहीं होता। फिर दक्षिण अफ्रीका में ब्रिटिश हुकूमत की अमानवीय रंगभेदी नीतियों का रोबदाब तो जैसे पल-पल गांधी की परीक्षा ही ले रहा था। स्टेशन से बाहर निकलने पर गाड़ी का कोचवान सीट पर बैठने के बजाय नीचे बैठने का फरमान सुनता है। होटल में रंगभेद की वजह से कमरा मिलाना मुश्किल। कोर्ट में पगड़ी पहनकर पैरवी करने पर मजिस्ट्रेट ने फटकार लगायी। विरोध में गांधी ने समाचार पत्रों में अंग्रेजों के इस रवैये के विरोध में कड़ा पत्र लिखा। इन सबके बावजूद करमचंद गांधी न कहीं झुके और न कहीं अपने उसूलों के साथ कोई समझौता किया। ब्रिटिश हुकमत इस तरह की हरकतों का मुकाबला करने के लिए ही सन् 1894 ई में नेटाल इंडियन कांग्रेस की स्थापना हुई। यह संगठन सिर्फ आंदोलन करने के लिए नहीं बना था, बल्कि गांधी इस संगठन के माध्यम से भारतीय समुदाय को अपने व्यापार और व्यवहार में सादगी और ईमानदारी बरतने की शिक्षा भी दे रहे थे। ब्रिटिश हुकूमत भारतीय समुदाय पर चाहे जितने तरह जुल्म ढ़ाया हो, पर गांधी की नीति उनसे वैसे ही बदला लेने की कभी नहीं रही है। गांधी की मान्यता है कि जब सामने वाला शत्रु मुश्किल में हों, तब उस पर बदले की भावना से वार करने के बजाय सहयोग करना चाहिए। इस नीति के तहत सन् 1899 में दक्षिण अफ्रीका पर नियंत्रण के लिए जब अंग्रेजों और बोअरों में युद्ध छिड़ा, तो मोहनदास करमचंद गांधी ने भारतीयों के साथ अंग्रेजों की हर तरह से मदद किया। पर ब्रिटिश हुक्मरान कुछ दूसरी मिट्टी के बने हुए लोग थे। गांधी की तमाम भलमनसाहत के बावजूद हमेशा धोखाधड़ी, तीनतिकड़म और दूसरों के हित- कल्याण को नजरअंदाज कर, अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए गांधी और भारतीय समुदाय को झांसे में डालने की रणनीति पर ही वे चलते रहें। नतीजतन गांधी को भी इन शैतानी ताकतों का मुकाबला करने के लिए नई तरह की रणनीति की रचना करनी पड़ी और संघर्ष के दूसरे तरीके आजमाने के लिए स्वयं को तैयार करना पड़ा। वह तरीका था सत्य और अहिंसा पर आधारित सत्याग्रह का रास्ता। 11 सितंबर 1906 को दक्षिण अफ्रीका के अंपायर थिएटर मैदान में ट्रांसवाल में रह रहें भारतीयों के नागरिकता सम्बन्धी पंजीकरण कराने के विरोध में आयोजित सभा में ‘सत्याग्रह’ का जन्म हुआ। यह सत्याग्रह आगे चलकर भारतीय स्वाधीनता का एक निर्णायक अस्त्र साबित हुआ। ट्रांसवाल की विधान परिषद में एक कानून पारित किया जिसमें सभी भारतीयों को अपनी नागरिकता संबंधी पंजीयन करना अनिवार्य कर दिया गया। 1 सितंबर सन् 1907 को यह पंजीयन कानून लागू हो गया। 18 दिसंबर 1907 को जोहान्सबर्ग की एक अदालत ने गांधी समेत 36 लोगों को नोटिस भिजवाया कि जिन लोगों ने अभी तक अपना पंजीयन नहीं कराया हैं, उन्हें देश से निकाल दिया जाएगा। गांधी ने तय किया कि इस कानून का उल्लंघन करेंगे और जो भी सजा अदालत मुकर्रर करेगी, उसे स्वीकार करेंगे। वहां के चालाक शासक जनरल स्मट् ने गांधी के सामने यह प्रस्ताव रखा कि -अगर भारतीय स्वेच्छा से अपना पंजीयन करा लेंगे, तो सरकार का यह कानून रद्द कर देगी। यह एक धोखे भरी चाल थी। गांधी भी जनरल स्मट् के बहकावे में आ गए। गांधी ने जनरल स्मट् पर भरोसा किया और जनरल स्मट् ने गांधी को उतनी ही शिद्दत के साथ धोखा दिया। दुश्मन पर भी भरोसा करना सत्याग्रह की नीति का एक अनिवार्य अंग है। गांधी उस नीति पर चलते रहें पर अंग्रेज जाति ने गांधी के इस भरोसे और सद् व्यवहार का हमेशा दुरपयोग किया। जनरल स्मट् ने भी वहीं किया जिसकी उम्मीद थी। वे अपने पूर्व वादे से पलट गये। सन् 1906 में रंगभेद की नीति के विरुद्ध शुरू सत्याग्रह आंदोलन सन् 1913 तक चलता रहा।इस बीच गांधी पर कम से कम तीन जानलेवा हमले हुए। कौम से साथ गद्दारी का आरोप लगा। पर गांधी अविचल काम में लगे रहें। बिना थके बिना रुके। सत्याग्रह अपनी घोषित नीति पर चलते हुए। लम्बे वक्त तक चलनेवाले इस आंदोलन को चलाने में इंडियन ओपिनियन अखबार की बड़ी भूमिका रही है। इस बात को गांधी खुद स्वीकार करते हैं। दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह आंदोलन के दौरान ही सन् 1909 में गांधी ने अपने विचारों को सूत्रबद्ध करना शुरू किया। जिसका परिणाम है उनके विचारों को बीजरुप में प्रस्तुत करने वाली पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ । जिसे कुछ विद्वान भारत की आजादी का घोषणापत्र भी कहते है। इस पुस्तक में दरअसल प्रचलित अर्थों में गांधी के राजनीतिक विचारों का ही समावेश नहीं है, बल्कि इसे सभ्यतागत विमर्श की दास्तान भी शामिल है। इस छोटी पुस्तिका में बताया गया है कि भारत में ब्रिटिश हुकूमत की वजह से भारतीय सभ्यता का जैसे लोप हो गया है। गांधी दावा करते हैं कि अगर भारतीय अपनी मूल सभ्यता पर कायम रहें, तो या तो अंग्रेज भारतीय हो जाएंगे अथवा भारत से बाहर हो जाएंगे।
भारत आने के बाद महात्मा गांधी कई मोर्चों पर एक साथ लड़ रहे थे। कई बार अकेले भी। भारत के स्वाधीनता आंदोलन में उनके शामिल होने के बाद कांग्रेस संगठन का जिस तरह से विस्तार हुआ और आम लोगों को निर्भय करने में गांधी ने जो भूमिका निभायी, वह सचमुच गौर करने लायक है। जो गरीब आमजन अंग्रेजों की ‘लालटोपी’ देखकर भाग खड़े होते थे, यह गांधी का ही प्रताप था कि वे अब अंग्रेजों के मुकाबले खड़े होने लगे। आचार्य नरेंद्र देव ने गांधी की इस भूमिका को स्वीकार करते हुए कहा है कि भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में गांधी की सबसे बड़ी देन यह है कि- उन्होंने आमजन को अभय कर दिया। फिर आम आदमी अपनी लड़ाई खुद ब खुद लड़ने लगा।
महात्मा गांधी जी मान्यता है कि – जिस आंदोलन की शक्ति आत्मबल हों, उसे चलाने के लिए अखबार की भूमिका महत्वपूर्ण है। गांधी ने चार अखबारों का प्रकाशन किया था। भारत में नवजीवन, यंग इंडिया, हरिजन और दक्षिण अफ्रीका में इंडियन ओपिनियन। 7 सितंबर 1909 में नवजीवन के गुजराती संस्करण के साथ ही गांधी जी सम्पादक की भूमिका में आते है। उनके प्रकाशनों की एक विशेषता यह रही कि वे विज्ञापन के बल पर अखबार नहीं निकालते है। गांधी किसी अखबार के लिए जरूरी मानते हैं कि-पत्रकारिता का दायित्व इतिहासकार की तरह सबसे पहले सत्य का पता लगाना है और अपने पाठकों के सामने वही चीज नहीं रखनी है, जो सरकार परोसना चाहती है, बल्कि वह सत्य पेश करना है जो वह प्राप्त करता है। गांधी जी एक अखबार की सफलता के लिए जरूरी शर्त यह मानते है कि – वह किस हद तक पाठकों के दिमाग को शिक्षित करता है। गांधी की पत्रकारिता लोक जागरण, सत्याग्रह -स्वराज, असहयोग -बहिष्कार, स्वदेशी- स्वावलंबन, सत्य और अहिंसा के लिए समर्पित पत्रकारिता थी। एक आदर्श पत्रकारिता के विषय में विनोबा भावे का विचार है कि -अगर भारत की एकता कायम रखनी है, तो हमें अपने प्रेस के जरिए सांस्कृतिक तथा चितशुद्धि के विषयों को अधिक महत्त्व देना चाहिए और पार्टी -पॉलिटिक्स को कम।
भारत में 10 मार्च 1922 को महात्मा गांधी की पहली गिरफ्तारी एक पत्रकार के रूप में हुई। यंग इंडिया में लिखे उनके तीन लेख उनके गिरफ्तारी के कारण बनें। पहला लेख- 29 सितंबर 1921 को, दूसरा लेख 15 दिसंबर 1921 को और तीसरा लेख 23 फरवरी 1922 को प्रकाशित हुए थे। हालांकि इन तीनों लेखों में जनता को किसी भी स्थिति में हिंसा से परहेज करने की हिदायत दी गयी थी। पर सरकार की नज़र में इन लेखों की वजह से ही गांधी पर हिंसा फैलाने का आरोप चस्पा किया गया। गांधी पर धारा 124 ए के तहत राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया। कोर्ट द्वारा छः साल की सजा मुकर्रर की गयी। पर दो साल बाद उन्हें स्वास्थ्य का हवाला देत हुए रिहा कर दिया गया। इस मुकदमे की पैरवी गांधी खुद कर रहे थे। बिना किसी सबूत बिना, किसी गवाह के, सत्य और नैतिकता के उच्च मानदंडों के आधार पर। गांधी जी अपना अपराध भी स्वीकार कर रहे थे। इस मुकदमे में गांधी कहीं भी के सत्य के साथ समझौता करते हुए नजर नहीं आये। मुकदमे की सुनवाई कर रहे जज ब्रूमफील्ड की नज़र में अभियुक्त बेहद पढ़ा लिखा और समाज में प्रतिष्ठित व्यक्ति है। अगर कोई सरकार उनकी सजा माफ कर दें, तो उन्हें बेहद खुशी होगी। इस सत्य और नैतिकता के सहारे ही वे भारतीय राजनीति का परिष्कार करना चाहते थे। उनके लिए राजनीति सिर्फ सम्भावनाओं का खेल नहीं ( बकौल बिस्मार्क) राजनीतिक महज सौदेबाजी, उखाड़- पछाड़ और जोड़-तोड़ के संभावनाओं की कला नहीं है। वह असंभावनाओं की भी कला है-एक ऐसी कला जिसमें अभ्यास से हम अपना और विश्व का परिष्कार कर सकते हैं। यह राजनीति में थोड़े से आध्यात्मिक संस्पर्श से ही संभव है। ( बकौल वैक्लाव हैवेल) पर गांधी जीवन से कट कर आध्यात्मिक जगत में विचरण करने वाले प्राणी नहीं थे। शिकायत रमण महर्षि को भी है। यह की एटलस की तरह अपनी पीठ पर सांसारिकता का बोझ लाद रखा था। इससे उनके आध्यात्मिक विकास की बलि चढ़ गयी। फिर भी अगर मानवता को उन्नति के शिखर तक पहुंचाना हैं, तो गांधी को कभी दरकिनार नहीं किया जा सकता है। वे हमारे बीच विश्व में शांति और सद्भाव के प्रणेता के रुप में हमेशा जिन्दा रहेंगे। हम अपने भविष्य को जोखिम में डालकर ही ( हमारे समय की जरूरत है गांधी) को इनकार कर सकते हैं।
