भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक महान भारतीय राष्ट्रवादी शिक्षक, समाज सुधारक, विख्यात वकील और स्वतंत्रता सेनानी के साथ ही त्याग की मूर्ति, ओजस्वी वक्ता, निर्भीक लेखक एवं संपादक तथा इतिहासकार श्री बाल गंगाधर तिलक का जन्म 23 जुलाई 1856 को रत्नागिरी के मराठीशाला गांव में हुआ था। आपका जन्म अतिसाधारण परिवार में हुआ। तिलक की प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई, उनके पिता श्रीगंगाधरपंत एक परिश्रमी शिक्षक थे। जब बाल 10 वर्ष के थे तब उनके पिता का तबादला पुणे हो गया एवं कुछ समय बाद ही उनकी मां उनके बाल्यकाल में ही स्वर्ग सिधार गई।
बाल अत्यंत मेधावी थे, उनका स्वभाव धीर, गंभीर और निडर था। उनका बचपन बेहद कष्टमय व्यतीत हुआ। वे गणित के कठिन प्रश्नों को मौखिक ही हल कर लेते थे। अपनी तिष्ण बुद्धि द्वारा मात्र 10 वर्ष की आयु में ही उन्होंने संस्कृत के श्लोकों की रचना करना सीख ली थी। कॉलेज में पढ़ने के दौरान उनका शरीर काफी दुर्बल था। 20 वर्ष की आयु में उन्होंने बी. ए.एवं उसके बाद एलएलबी की परीक्षा उत्तीर्ण की।
एक बार का प्रसंग है की स्कूल में अध्यापक ने उनकी शरारत पर उन्हें “सिरफिरे छोकरे” कहकर संबोधित किया। गलत बातो के विरोध में उन्हें उल्टे जवाब देने में महारथ हासिल थी। जब अध्यापक ने उन्हें कहा कि तुम्हे मैं अभी दंड देता हूं,उसी समय तत्काल वे अपनी पुस्तकें उठाकर कक्षा से बाहर चले गए। उन्होंने कहा कि मैं अन्याय के आगे झुकने वाला नहीं हूं, ऐसे सच्चे, निडर और स्वाभिमानी बालक थे “बाल गंगाधर तिलक” ।
एक बार तिलक ने इंग्लैंड की महारानी की तस्वीर जमीन पर गीराकर पैरों तले रौंद डाली, और कहा कि हम सब अपनी आपसी फूट के कारण गुलाम बने हैं। अब हमें चाहिए कि हम सब एकजुट होकर अंग्रेजों को रौंद डालें। ब्रिटिश सरकार ने उन दिनों भारतीय कपड़ों पर टैक्स अत्यधिक बढ़ा दिया ताकि स्वदेशी कपड़ो की तुलना में ब्रिटेन से आने वाला कपड़ा अधिक मात्रा में बिके। लेकिन ऐसे अन्याय के विरुद्ध बाल चुप रहने वाले नहीं थे, उन्होंने ऐलान किया कि अगर हम स्वदेशी कपड़ा नहीं खरीदेंगे तो इसे और कौन खरीदेगा? हम सभी का व्यापार कैसे चलेगा। अगर तुम्हें अपना देश, अपने लोग प्यारे हैं तो थोड़ा ज्यादा पैसा देकर भी विदेशी कपड़ों का बहिष्कार करो और स्वदेशी को अपनाओ।
बाल गंगाधर तिलक ने भारतीय स्वतंत्रता के लिए नए-नए विचार रखे और अनेकों प्रयत्न भी किए। अंग्रेज उन्हें “भारतीय अशांति के पिता” कहकर संबोधित करते थे। वे स्वराज्य के सबसे पहले और मजबूत अधिवक्ताओं में से एक थे। उनका मराठी नारा हिंदी में इस प्रकार प्रसिद्ध हुआ कि “स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, और मैं इसे लेकर ही रहूंगा”। उनका यह नारा बहुत ही प्रसिद्ध हुआ और इसके बाद तिलक को लोकमान्य की उपाधि प्राप्त हुई एवं लोगों द्वारा सम्मान प्राप्त होता गया। तिलक ने स्वामी विवेकानंद को अपना राजनीतिक गुरु बनाया एवं स्वामी विवेकानंद ने उन्हें अपने शिष्य के रूप में स्वीकार किया।
उन्होंने हिंदी, अंग्रेजी, मराठी और संस्कृत भाषा में अनेकों लेख लिखें, साथ ही अनेकों महत्वपूर्ण पुस्तकें भी लिखी। राजनीतिक जागरण के लिए उन्होंने केसरी (मराठी भाषा) और मराठा (अंग्रेजी भाषा) दो समाचारपत्र प्रकाशित किए। इन समाचार पत्रों के द्वारा उन्होंने अंग्रेजी शासन की तीखी आलोचना की। राष्ट्रीयता की शिक्षा, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग पर उन्होंने बहुत जोर दिया। सरकार की तीखी आलोचना के कारण उन्हें 18 माह का सश्रम कारावास का दंड मिला, इस दंड के विरोध में उनके समर्थन में अनेकों स्थानों पर जनसभाएं हुई लेकिन इन सभाओं का सरकार पर कोई प्रभाव नहीं हुआ। वर्ष 1908 में राजद्रोह के अपराध में उन्हें 6 वर्ष के लिये मांडले जेल भेज दिया गया । इन दंड के कारण उन्होंने भय से कभी भी सत्य के मार्ग को नहीं छोड़ा।
महात्मा गांधी ने लोकमान्य को “आधुनिक भारत का निर्माता” और पंडित नेहरू को “भारतीय क्रांति के जनक” की उपाधि से नवाजा।1907 में कांग्रेस गरम दल एवं नरम दल में विभाजित हो गई। गरम दल में लोकमान्य तिलक के साथ लाला लाजपत राय और बिपिनचंद्र पाल शामिल थे। इन तीनों की जोड़ी को “लाल-बाल-पाल’ की जोड़ी के नाम से जाना जाता था।
राष्ट्र के लिए अनेकों कष्ट सहन करते हुए मधुमेह (डायबिटीज) की बीमारी से पीड़ित होने के बाद 1 अगस्त 1920 को मुंबई में उनका देवलोक गमन हो गया। अंततः 15 अगस्त 1947 को भारत को आजादी मिली, जिसमें अनवरत संघर्ष करते हुए भारत की आजादी का जो सपना उ उन्होंने देखा था, वह संपूर्ण रूप से पूर्ण हुआ।
डॉ. बी.आर. नलवाया
मंदसौर
