सोशल मीडिया के माध्यम से सरकार ने कसा नागरिकों पर शिकंजा
नई दिल्ल। भारत में अब नागरिकों की निजता को सुरक्षित रख पाना, किसी के लिए संभव नहीं होगा। सरकार ने सोशल मीडिया कंपनियों को आधार और अन्य आईडी,जो सरकार द्वारा जारी की गई हैं। उसके आधार पर सोशल मीडिया के यूजर्स का वेरिफिकेशन करने का नियम बनाया है।
इस माह के प्रारंभ से ही फेसबुक की पैरंट कंपनी,मेटा प्लेटफॉर्म्स ने कंटेंट निर्माताओं के लिए अकाउंट वेरीफिकेशन का काम शुरू किया है। उसके लिए सरकारी आईडी मांगी जा रही है।
नई पालिसी के अनुसार मेटा अकाउंट वेरीफिकेशन के लिए सरकारी फोटो आईडी, एनजीओ की आईडी या लाइसेंस स्वीकार किए जाएंगे। इससे अब यूजर्स का डाटा कंपनी के पास तो होगा ही, साथ में सरकार के पोर्टल से भी यह डेटा लिंक हो जाएगा। सरकार जब चाहे तब कंटेन के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकेगी, और कार्यवाही भी कर सकेगी। सूत्रों के अनुसार सरकार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को जिम्मेदार बनाने के साथ-साथ सीधे यूजर्स तक सरकार की पहुंच बनाने के लिए यह नियम बनाया है।
कहा जाता है, कि सोशल मीडिया में जो भी कंटेंट पोस्ट किया जाता है। उस पर अब सरकार की पहुंच हो गई है। कुछ भी गोपनीय नहीं रहा। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के साथ पहचान से जुड़ा पर्सनल डाटा साझा करने के बहुत सारे जोखिम सामने आए हैं। ऑनलाइन डाटा लीक होने के बाद बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी बढ़ी है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समय-समय पर सोशल मीडिया साइट्स के डेटा बड़े पैमाने पर लीक हुए हैं। उन्हें हैक किया गया है।
सोशल मीडिया कंपनियों ने वेरीफिकेशन प्रक्रिया के लिए फीस लेना शुरू कर दी है। जिसमें वह प्रतिमाह अरबों रुपए की कमाई करेंगे। मेटा बेब बेस्ड यूजर्स से वेरीफाइड सर्विस के लिए हार माह 599 रुपये और एंड्राइड तथा आईओएस यूजर्स के लिए 699 रुपये प्रति माह शुल्क की वसूली होगी। इंटरनेट आधारित सोशल मीडिया के कोई भी प्लेटफार्म अब सुरक्षित नहीं बचे। निजता की भी कोई गारंटी नहीं है। सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने नागरिकों की निजता भंग ना हो इसके लिए फैसला दिया है। इसके बाद भी सोशल मीडिया कंपनियों के डाटा लीक होने या कोई भी नुकसान यूजर्स को होने पर भरपाई का कोई कानून भारत में नहीं है। जिसके कारण लोगों को आर्थिक एवं मानसिक नुकसान लगातार हो रहा है।
