जन्म लिया है तो मृत्यु निश्चित है । यही सोच हर समय मानव को रखकर अपने जीवन को जीना चाहिये । इसके पीछे एक मेरा उद्देश्य यह भी है की मृत्यु होना निश्चित है लेकिन कब , कहाँ आदि होगी इसके बारे में हमको अभी वर्तमान में नहीं पता है । यह केवली भगवान या साधना से लब्धि प्राप्त साधु आदि ही बता सकते है । विगत और आगत दो शब्दों के बीच हमारी जीवन नैया चलती रहती है । हर रोज का जीवन का ये एक हिस्सा है ।हम प्रति पल सावधान रहते हुए अपनी आत्मविशुद्धि के लिए कषायों को उपशान्त करने का प्रयत्न करें ।हमारा चिंतन ये चले कि हमारा प्रमाद हम पर हावी तो नहीं हो रहा है । हम ने जो करना है इसी पल करने की आदत बनाएं बाद में करेंगे कि हमारी भावना न पनपे हम में।समय की कीमत को जानते हुए हर पल अपना सिंहावलोकन करते रहे।पता नहीं कौनसा पल हमारे जीवन का आखिरी पल हो।काल का पहिया तो अनावरत चलता रहता है । यह कभी रुकने वाला नहीं होता हमारे मनुष्य क्षेत्र में। दिन-रात,साल आदि काल परिवर्तनशील है ।समय जो काल की सबसे सूक्ष्म अविभाज्य इकाई है ,वह वर्तमान समय ध्रुव,नित्य व शाश्वत है।हम उसमें जीना सीखें और अपने प्रमाद पर काबू पाते हुए कषायों को उपशान्त करते हुए आत्मकल्याण करें।विगत और आगत ,नूतन और पुरातन हम इसमें न उलझकर अपना कर्मों से मुक्त होने की दिशा में अग्रसर होने के लिए प्रयासरत हो निरन्तर। सर्वोत्तम तो है हो कर निर्भय, प्रसन्न मन, अपनाना चाहिए हमें पंडित मरण जान अंत समय में ताकि हमारा जीवन हो जाए सफलतम।
प्रदीप छाजेड़
( बोरावड़ )
