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लखनऊ, 10 सितंबर । उत्तर प्रदेश में भूमिहीन किसान परिवारों, विशेषकर महिलाओं की सामाजिक—आर्थिक—स्थिति अत्यंत असंतोषजनक है। यद्यपि कृषि क्षेत्र में महिलाओं की श्रम—भागीदारी निरंतर बढ़ रही है। किन्तु भूमि स्वामित्व,नकद मजदूरी,साक्षरता तथा निर्णय—क्षमता जैसे सूचकों में महिलाएं अब भी बहुत पीछे हैं।
यह जानकारी श्यामा प्रसाद मुखर्जी कालेज,दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान की प्रोफेसर डा. चंद्रकांता के.माथुर ने दी। डा. चंद्रकांता ने उत्तर प्रदेश में भूमिहीन कृषि श्रमिक महिलाओं एवं उनके परिवारों की सामाजिक आर्थिक स्थिति पर एक सर्वे रिपोर्ट तैयार की है। रिपोर्ट का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि सीमांत एवं भूमिहीन परिवारों में महिलाओं की सहभागिता सर्वाधिक होने के बावजूद उन्हें श्रम का समुचित पारिश्रमिक अथवा संसाधनों पर अधिकार प्राप्त नहीं होता। जाति आधारित सामाजिक असमानता,विशेषकर अनूसूचित जाति की महिलाओं के संदर्भ में इस संकट को और गहन बना देती है।
डा.चन्द्रकान्ता ने गुरूवार को हिन्दुस्थान समाचार से कहा कि किसान और भूमिहीन खेतमजदूर — दोनों के सहयोग से ही खेती आगे चलती है। किसान परिवारों में तथा भूमिहीन परिवारों में महिला अपने परिवार के दायित्वों के साथ—साथ खेती में सक्रिय भूमिका का निर्वाह करती है। इसलिए इन दोनों महिला समूहों के बीच सामंजस्य आवश्यक है। इसी सामंजस्य के द्वारा ग्रामीण भारत में समरसता संभव है। नवीन भारत के निर्माण में इन दोनों महिला समूहों से नेतृत्व आना अति आवश्यक है।
डा.चन्द्रकान्ता माथुर ने बताया कि उत्तर प्रदेश की कार्यशील जनसंख्या में कृषि श्रमिकों का महत्वपूर्ण योगदान है, वहीं क्षेत्रवार विकास में भारी विषमताएं विद्यमान हैं। राज्य की लगभग 20.7 प्रतिशत जनसंख्या अनुसूचित जाति वर्ग से है, जो परंपरागत रूप से भूमिहीन कृषि श्रम में सर्वाधिक संकेंद्रित रही है। इसका सर्वाधिक प्रभाव महिलाओं व उनके बच्चों पर पड़ता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश एवं बुन्देलखण्ड में भूमिहीन कृषि श्रमिक परिवारों की महिलाओं की निर्धनता सबसे अधिक पाई जाती है। इसके विपरीत पश्चिमी क्षेत्र में अपेक्षाकृत बेहतर आर्थिक स्थिति में है।
