*इंदौर, 09 जुलाई 2026।* गर्भावस्था के 34वें सप्ताह में जब 34 वर्षीय श्रीमती पुरोहित को लगातार दो से तीन दिनों तक गर्भ में शिशु की हलचल सामान्य से काफी कम महसूस हुई तो उन्होंने केयर सीएचएल हॉस्पिटल्स में परामर्श लिया। जांच के दौरान सामने आया कि यह सामान्य मामला नहीं, बल्कि पहले से ही कई जटिलताओं से जुड़ी हाई रिस्क प्रेग्नेंसी थी। विशेषज्ञों ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए बिना समय गंवाए इमरजेंसी सिजेरियन सर्जरी का निर्णय लिया। स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञों के साथ नवजात शिशु विशेषज्ञों की समन्वित देखभाल से मां और नवजात दोनों को सुरक्षित रखा जा सका।
जांच में पता चला कि मरीज का यह गर्भ पहले से ही कई कारणों से जोखिमपूर्ण था। उन्हें पहले दो बार गर्भपात हो चुका था। इसके अलावा वे थ्रोम्बोफिलिया यानी एंटीथ्रोम्बिन थ्री की कमी से भी पीड़ित थीं। यह ऐसी स्थिति है जिसमें खून का थक्का बनने का खतरा बढ़ जाता है और गर्भस्थ शिशु तक पर्याप्त रक्त प्रवाह प्रभावित हो सकता है। अल्ट्रासाउंड में फिटल ग्रोथ रेस्ट्रिक्शन की पुष्टि हुई। गर्भनाल के माध्यम से शिशु तक पर्याप्त ऑक्सीजन और पोषण नहीं पहुंच पा रहा था, जिसके कारण उसका विकास सामान्य गति से नहीं हो रहा था। इसी वजह से शिशु की गतिविधियों में कमी आना चिंता का विषय था।
केयर सीएचएल हॉस्पिटल्स की सीनियर कंसल्टेंट गायनेकोलॉजी एवं लैप्रोस्कोपिक सर्जन डॉ. नीना अग्रवाल के नेतृत्व में विशेषज्ञ टीम ने मरीज की स्थिति का विस्तृत मूल्यांकन किया। जांच के बाद यह स्पष्ट हुआ कि गर्भावस्था को आगे जारी रखना मां और शिशु दोनों के लिए जोखिम बढ़ा सकता है। इसके बाद तत्काल इमरजेंसी लोअर सेगमेंट सिजेरियन सेक्शन (एलएससीएस) किया गया।
सर्जरी के दौरान 1.33 किलोग्राम वजन की बच्ची का सुरक्षित जन्म हुआ। जन्म लेते ही बच्ची ने स्वयं रोना शुरू कर दिया, जो उसके स्वस्थ श्वसन का सकारात्मक संकेत था। इसके बाद बच्ची को केयर सीएचएल हॉस्पिटल्स के सीनियर कंसल्टेंट पीडियाट्रिक्स डॉ. मनीष जैन और उनकी एनआईसीयू टीम की निगरानी में भर्ती किया गया, जहां उसे विशेष नवजात चिकित्सा उपलब्ध कराई गई।
एनआईसीयू में भर्ती के दौरान बच्ची को शुरुआती 48 घंटे तक सीपीएपी के माध्यम से ऑक्सीजन सपोर्ट दिया गया। उपचार के दौरान उसे नेक्रोटाइजिंग एंटेरोकोलाइटिस (एनईसी) की समस्या विकसित हुई, जिसके बाद विशेषज्ञ टीम ने तुरंत आवश्यक कंजर्वेटिव उपचार शुरू किया। उपचार का बच्ची पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा और उसकी स्थिति में लगातार सुधार होता गया। जन्म के छठे दिन बच्ची को मां के पास शिफ्ट कर दिया गया। डिस्चार्ज के समय बच्ची पूरी तरह क्लीनिकली स्थिर थी, अच्छी तरह दूध पी रही थी और उसे सुरक्षित रूप से अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
*केयर सीएचएल हॉस्पिटल की डॉ. नीना अग्रवाल, सीनियर कंसल्टेंट गायनेकोलॉजी एवं लैप्रोस्कोपिक सर्जन ने कहा,* “पूरी सर्जरी सफलतापूर्वक संपन्न हुई। ऑपरेशन के दौरान प्लेसेंटा पूरी तरह सुरक्षित निकाला गया और रक्तस्राव भी न्यूनतम रहा। सर्जरी के बाद मां की स्थिति लगातार स्थिर बनी रही और उनकी रिकवरी संतोषजनक रही। नवजात की भी विशेषज्ञों की निगरानी में देखभाल की गई। समय पर लिए गए चिकित्सकीय निर्णय और विभिन्न विभागों के समन्वित प्रयासों से इस जटिल हाई रिस्क प्रेग्नेंसी का सफल प्रबंधन संभव हो सका। गर्भावस्था के दौरान यदि शिशु की हलचल अचानक कम महसूस हो, तो इसे कभी भी सामान्य मानकर अनदेखा नहीं करना चाहिए। विशेष रूप से जिन महिलाओं को पहले गर्भपात हो चुका हो, रक्त से जुड़ी कोई बीमारी हो या गर्भावस्था को हाई रिस्क श्रेणी में रखा गया हो, उन्हें नियमित जांच करानी चाहिए। समय पर अस्पताल पहुंचने और विशेषज्ञों की सलाह लेने से गंभीर जटिलताओं से बचा जा सकता है और मां तथा शिशु दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।”
*केयर सीएचएल हॉस्पिटल्स के सीनियर कंसल्टेंट पीडियाट्रिक्स डॉ. मनीष जैन ने कहा,* “समय से पहले जन्म लेने वाले और कम वजन वाले नवजात शिशुओं को जन्म के बाद विशेष निगरानी और विशेषज्ञ उपचार की आवश्यकता होती है। इस बच्ची को एनआईसीयू में निरंतर मॉनिटरिंग, श्वसन सहायता और आवश्यक उपचार दिया गया। उपचार के दौरान एनईसी जैसी जटिलता भी सामने आई, लेकिन समय पर पहचान और उचित चिकित्सा से उसकी स्थिति में लगातार सुधार हुआ। डिस्चार्ज के समय बच्ची पूरी तरह स्थिर थी, अच्छी तरह फीड ले रही थी और उसकी सभी महत्वपूर्ण स्वास्थ्य संबंधी जांच संतोषजनक थीं।”
