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समाज सेवा की राह पर चलते हुए दूसरों के जीवन में प्रकाश बिखेरना और इतिहास के विस्मृत पन्नों को समाज के समक्ष जीवंत करना हर किसी के बस की बात नहीं होती। लेकिन कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जो अपने दृढ़ संकल्प और सेवा भावना से समाज के सामने एक अनूठा उदाहरण पेश करते हैं। ऐसे ही एक प्रखर और सेवाभावी व्यक्तित्व हैं श्री मदन परमालिया।
आगामी 9 जुलाई को मदन परमालिया जी अपना 60वां जन्मदिन मनाने जा रहे हैं। शून्य से शिखर तक का उनका यह सफर आज “बेमिसाल 60 साल” के रूप में हमारे सामने है। समाज सेवा के प्रति उनके इसी बेमिसाल समर्पण, स्वतंत्रता सेनानियों को देश में सही पहचान दिलाने के उनके अविस्मरणीय योगदान और सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण हेतु 11 जुलाई को श्री गीता रामेश्वरम ट्रस्ट द्वारा उनका भव्य नागरिक अभिनंदन किया जा रहा है।
राष्ट्रभक्ति की अनूठी विरासत और सेना की नौकरी का त्याग
मदन परमालिया जी को राष्ट्रभक्ति और सेवा की प्रेरणा विरासत में मिली है। उनका जन्म प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी श्री गरीबा परमालिया और श्रीमती बुद्ध बाई परमालिया के देशभक्त परिवार में हुआ। पारिवारिक संस्कारों का ही असर था कि विषम परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई। देश सेवा का जज्बा उनके भीतर इस कदर कूट-कूट कर भरा था कि उन्होंने भारत माता की सेवा के लिए सेना (Army) की प्रतिष्ठित नौकरी तक का त्याग कर दिया और खुद को पूरी तरह से समाज सेवा के लिए समर्पित कर दिया।
स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मान दिलाने का महाअभियान
मदन जी ने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा देश के उन वीर सपूतों के इतिहास को सहेजने और उन्हें सम्मान दिलाने में लगा दिया, जिन्हें इतिहास की मुख्यधारा में वह स्थान नहीं मिल सका जिसके वे हकदार थे।
500 से अधिक विभूतियों का सम्मान: उन्होंने ‘नेताजी सुभाष अलंकरण’ और ‘आजाद अलंकरण’ के माध्यम से अब तक 500 से अधिक महान विभूतियों को अलंकृत और सम्मानित किया है।
शताब्दी समारोह का भव्य नेतृत्व: नेताजी सुभाष चंद्र बोस के शताब्दी समारोह को उनके कुशल नेतृत्व में बेहद भव्य रूप से मनाया गया था।
अमर शहीदों की स्मृतियों का संरक्षण: उन्होंने अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद की जन्मस्थली भाबरा स्मारक स्थल के विकास के लिए न सिर्फ पहल की, बल्कि उसके कायाकल्प में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अंतिम विदाई में राजकीय सम्मान: स्वाधीनता सेनानियों के निधन के बाद उन्हें पूरे राजकीय सम्मान के साथ ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ (Guard of Honour) मिले, इसके लिए मदन जी ने धरातल पर सक्रियता से लंबा संघर्ष किया है।
सांस्कृतिक और लोक कलाकारों के संवर्धन में अग्रणी भूमिका
मदन परमालिया जी का योगदान केवल इतिहास के संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि वे सांस्कृतिक और लोक विधाओं के भी बड़े संरक्षक रहे हैं।
मालव रत्न अलंकरण की शुरुआत: गणेश उत्सव और विसर्जन झांकी बनाने वाले शिल्पकारों व कलाकारों के सम्मान में उन्होंने ‘मालव रत्न अलंकरण’ देने की शानदार परंपरा शुरू की, जो आज भी निरंतर जारी है।
झांकी समितियों को आर्थिक संबल: कभी आर्थिक तंगी से जूझने वाली गणेश विसर्जन झांकी निर्माण समितियों को आर्थिक सहयोग दिलाने के लिए मदन जी ने एक लंबा और कड़ा संघर्ष किया। उनके इन्हीं प्रयासों का परिणाम है कि आज शासन-प्रशासन और विभिन्न संस्थाएं इन समितियों को खुलकर आर्थिक सहयोग प्रदान कर रही हैं, जिससे यह प्राचीन लोक कला जीवित और समृद्ध है।
“सेवा का यह सफर कभी नहीं थमेगा…”
मदन परमालिया जी का मानना है कि समाज की उन्नति के लिए किए जाने वाले कार्य किसी पड़ाव पर रुकते नहीं हैं। अपने जीवन के 60 गौरवशाली वर्ष पूरे करने के बाद भी उनकी ऊर्जा और सेवा का संकल्प युवाओं को प्रेरित करने वाला है।
श्री गीता रामेश्वरम ट्रस्ट द्वारा 11 जुलाई को होने वाला उनका नागरिक अभिनंदन वास्तव में एक ऐसे व्यक्तित्व का सम्मान है, जिसने अपना पूरा जीवन राष्ट्र, संस्कृति और समाज के कल्याण के लिए होम कर दिया। उनके इस “बेमिसाल 60 साल” के सफर पर पूरा समाज उन्हें नमन करता है और उनके उत्तम स्वास्थ्य व दीर्घायु की कामना करता है।
