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✍️ लेखक : देवेंद्र कुमार साहू
🖋️ संपादक : माधव एक्सप्रेस
भारत की संस्कृति सदियों से दया, करुणा और जीवों के प्रति प्रेम का संदेश देती आई है। हमारे धर्मग्रंथों में भी कहा गया है कि “अहिंसा परमोधर्मः” अर्थात अहिंसा ही सबसे बड़ा धर्म है। जब भी हम किसी तीर्थ स्थान की यात्रा पर निकलते हैं, तो हमारे मन में भगवान के दर्शन, आत्मिक शांति और पुण्य प्राप्ति की भावना होती है। लेकिन आज धीरे-धीरे तीर्थ यात्राओं का स्वरूप ऐसा बनता जा रहा है, जहां सुविधा के नाम पर कई बार मासूम पशुओं पर अत्यधिक बोझ डाल दिया जाता है।
पहाड़ी और कठिन तीर्थ स्थलों पर घोड़े, खच्चर और बागी के सहारे श्रद्धालुओं को यात्रा कराई जाती है। यह सच है कि कई लोग स्वास्थ्य, उम्र या शारीरिक कमजोरी के कारण इन साधनों का सहारा लेते हैं, लेकिन जो लोग पूरी तरह समर्थ हैं, उन्हें एक बार जरूर सोचना चाहिए कि क्या केवल सुविधा के लिए किसी बेजुबान जीव को तकलीफ देना उचित है?
घोड़े और खच्चर भी जीव हैं। उन्हें भी दर्द होता है, थकान महसूस होती है, भूख-प्यास लगती है। कई बार अत्यधिक वजन और लगातार कठिन रास्तों पर चलने के कारण ये पशु घायल हो जाते हैं, बीमार पड़ जाते हैं और कुछ अपनी जान तक गंवा देते हैं। यह दृश्य केवल इंसानियत ही नहीं, बल्कि हमारी आस्था पर भी सवाल खड़ा करता है।
भगवान ने केवल मनुष्य को ही नहीं, बल्कि हर जीव को बनाया है। यदि हमारी भक्ति किसी मासूम प्राणी की पीड़ा का कारण बन जाए, तो हमें अपने कर्मों पर विचार करने की आवश्यकता है। तीर्थ यात्रा का असली उद्देश्य केवल मंदिर तक पहुंचना नहीं, बल्कि अपने भीतर दया, प्रेम और संवेदना को जागृत करना भी है।
यदि हम स्वस्थ और सक्षम हैं, तो हमें पैदल चलकर यात्रा करने का प्रयास करना चाहिए। इससे न केवल शरीर स्वस्थ रहता है, बल्कि मन में संतोष और आत्मिक शांति भी प्राप्त होती है। कठिन रास्तों पर अपने कदमों से चलकर भगवान के दर्शन करना एक अलग ही पुण्य और आनंद देता है।
समाज को भी अब इस विषय पर गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है। पशुओं के प्रति संवेदनशीलता दिखाना केवल कानून या नियम का विषय नहीं, बल्कि मानवता का सबसे बड़ा धर्म है। हमें अपने बच्चों और आने वाली पीढ़ियों को भी यह सीख देनी होगी कि सच्ची भक्ति वही है, जिसमें हर जीव के प्रति प्रेम और करुणा हो।
तीर्थ स्थान पर दर्शन करने जाइए, पाप करने नहीं।
जहां जीवों पर दया होती है, वहीं सच्चे भगवान का वास होता है।
दया, करुणा और संवेदना ही मानव जीवन की सबसे बड़ी पूजा है।
(यदि किसी व्यक्ति विशेष को मेरे इन शब्दों के द्वारा ठेस पहुंची हो तो मुझे क्षमा करें पर सत्य यही है)🙏
