।। ललित भाटी।।
कुल मिलाकर , आज की निरंतर रसातल में जा रही कांग्रेस को, अपने वर्तमान कमजोर पैरों पर जैसे -तैसे टिके रहने के लिए, एकमात्र और अंतिम रूप से यही रास्ता नज़र आ रहा है कि, विभिन्न प्रदेशों से लेकर, केंद्र तक में विराजित भाजपा सरकारों के विरुद्ध , जन समस्याओं से संबद्ध कोई भी मुद्दा गहरी नज़रें गड़ाकर खोजो। उसे जबरदस्त राजनीतिक हवा दो। उस पर अपना अति प्रबल राजनीतिक विरोध बताओ। और फिर चाहे जिस भी तरीके को अपनाकर, सत्ता प्राप्ति के अपने प्रयासों के अंतर्गत, अपनी राजनीतिक रोटियां सेकते रहो। कांग्रेस से जुडी राजनीति का विगत एक दशक , इस सच की पर्याप्त गवाही देता है।
लेकिन केवल और केवल कांग्रेस ही नहीं, जो भी राजनीतिक दल इस तरह के थोथे और निरर्थक प्रयास करता है, वह उसे संपन्न करने के दौरान, इस एक बड़ी बात को विस्मृत कर जाता है कि, इस देश का एक आम नागरिक भी ज्यादा न सही, कुछ हद तक तो समझदार है। वह उक्त किस्म के राजनेताओं की तरह, भले ही शुद्ध घी लगी रोटी न खा पाता हो, फ़िर किसी खाता तो रोटी ही है,
घांस तो बिल्कुल भी नहीं। सत्ता प्राप्ति के लिए तरसते राजनेताओं के झूठे बहकावे में आना अब वह छोड़ चुका है। राजनीति और सत्ता के मानदंड पर कौन सा राजनीतिक दल तथा किस दल की सत्ता उसकी वास्तविक हित चिंतक है, वह इसका अनुमान लगाने में भी परिपक्व हो गया है। बावजूद इसके, हमारे देश में अधिकांश राजनीतिक दलों के बड़ी संख्या के राजनेता, उसे राजनीतिक रूप से अनपढ़ समझने की भूल लगातार करते चले आ रहे हैं।
बात यहां कांग्रेस को लेकर विस्तार पा रही है। ठीक इसी तारतम्य में कहने / लिखने /में आता है कि, कांग्रेस की स्थिति वर्तमान में राजनीतिक रुप से इतनी निर्बल हो गई है कि, उसे स्वयं को मजबूत करने का कोई भी राजनीतिक सुमार्ग दिखाई नहीं दे रहा है। और यदि दिख भी रहा है, तो वह उस पर चलना नहीं चाहती है। सिर्फ और सिर्फ़ अपने विपक्षी दल की विराजित सत्ता का जमकर विरोध कब / कैसे / कहां / किस / मुद्दे पर करना है, अब उसकी एकमात्र राजनीतिक साधना यही रह गई है। अपने सभी तरह के , तमाम राजनीतिक हितों को साधने के लिए, अपनी ही पार्टी के सर्वोच्च शीर्ष नेतृत्व की स्वामी भक्ति करते रहना ही, अब उसका महत्त्वपूर्ण राजनीतिक लक्ष्य बनकर रह गया है।
अपना बहुत कुछ राजनीतिक नुकसान कर लेने के बाद भी, अपने राजनीतिक आचरण में तनिक भी सुधार / परिवर्तन / करने की संभावनाएं वह भूलती जा रही है। उसकी अति मूल्यवान सार्थक राजनीतिक उर्जा, जनमानस में नितांत अरुचिकर कार्यों में निर्ममता से खर्च हो रही है। क्या इस बात को अस्वीकृत किया जा सकता है कि, किसी भी राजनीतिक दल का अपने विरोधी राजनीतिक दल के प्रति किए जाने वाला विरोध प्रदर्शन तब युक्तिसंगत महसूस होता है, जबकि वह राजनीति और संगठनात्मक दृष्टि से स्वयं बलशाली हो। लेकिन वर्तमान की कांग्रेस के पक्ष में ऐसा जरा भी नहीं है। वह अपने शीर्ष नेतृत्व को लेकर, अपरिपक्वता के जिस सर्वाधिक बुरे समय से निकल रही है, उसे सिवाय उसके , देश की राजनीति में नाममात्र की रुचि रखने वाला व्यक्ति भी बेहतर तरीके से अनुभव कर रहा है, कांग्रेस को छोड़कर।
क्या देश एवं विदेशों तक में अपने एक प्रतिष्ठित और महत्त्वपूर्ण समयकाल में , देश के लिए पूरी तरह से समर्पित रहे कांग्रेस के कतिपय वरिष्ठ / अनुभवी / प्रतिभाशाली / राजनेताओं की, अपने इसी दल को लेकर , घर नीतिगत जिम्मेदारी नहीं बनती है कि, यदि वे अपनी इस राजनीतिक पार्टी ये एकदम सच्ची श्रद्धा भावना से जुड़े हैं, तो सबसे पहले उसका निरंतर हो रहा हित / अहित / देखें, न कि उससे जुड़े किसी भी नेतृत्वकर्ता राजनेता विशेष का। सच तो यह भी कहने को तत्पर बैठा है कि, इस देश में कांग्रेस को पूरी तरह से अस्वीकृत करने वाला , एक सामान्य नागरिक भी यही चाहता है कि, भले ही कांग्रेस अपनी कथनी / करनी / के चलते सत्ता पर विराजित न हो, लेकिन देश के राजनीतिक संदर्भ में, एक शक्तिशाली विपक्ष बनकर जरूर प्रस्तुत होती रहे, ताकि वर्तमान की सत्ता भी अपनी अनीतिगत राजनीतिक मनमानियों को संपन्न न कर पाए। उस पर एक ताकतवर विपक्ष का नियंत्रण बना रहे।
