शिक्षा मंत्री की पहल पर विद्यार्थियों को बड़ी राहत, अब शैक्षणिक दस्तावेजों के लिए नहीं लगाने पड़ेंगे चक्कर
Spread the loveरायपुर – विद्यार्थियों को शैक्षणिक दस्तावेजों...
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Spread the loveनिप्र,जावरा मध्यप्रदेश के रतलाम जिले में...
Spread the loveरायपुर। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व...
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति इन दिनों बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम के इर्द-गिर्द सिमटती नजर आ रही है। आगामी विधानसभा चुनावों की आहट के बीच दलित मतों को साधने की होड़ में विपक्षी दलों और सत्ता पक्ष के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है। हाल ही में १५ मार्च को कांशीराम की ९३वीं जयंती के अवसर पर कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने केंद्र सरकार से उन्हें भारत रत्न देने की मांग की, जिसने राज्य के सियासी पारे को बढ़ा दिया है। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर दलितों के उत्थान में कांशीराम के योगदान को रेखांकित किया और उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाजने का आग्रह किया। हालांकि, कांग्रेस की इस पहल पर बसपा प्रमुख मायावती ने कड़ी आपत्ति जताई है। मायावती ने राहुल गांधी की मांग को बेतुका करार देते हुए कहा कि जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी, तब उन्होंने कांशीराम को सम्मानित क्यों नहीं किया? उन्होंने कांग्रेस और समाजवादी पार्टी दोनों को दलित विरोधी बताते हुए आरोप लगाया कि ये दल केवल चुनावों के वक्त बहुजन नायकों को याद करते हैं। मायावती ने तीखा हमला बोलते हुए कहा कि सपा और कांग्रेस के पास अब अपने कोई महान नेता नहीं बचे हैं, इसलिए वे बसपा के महापुरुषों के नाम पर वोट बटोरने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने याद दिलाया कि जब कांशीराम जीवित थे, तब इन्हीं पार्टियों ने उन्हें हमेशा नजरअंदाज किया। उन्होंने समाजवादी पार्टी पर भी निशाना साधा और कहा कि अखिलेश यादव द्वारा हर जिले में कांशीराम जयंती को पीडीए दिवस के रूप में मनाना महज एक अवसरवादी कदम है। मायावती के अनुसार, बसपा शासनकाल में कांशीराम के सम्मान में किए गए कार्यों को सपा सरकार ने ही पलटने का काम किया था। सत्ता पक्ष की ओर से भी इस मामले पर प्रतिक्रिया आई है। यूपी के कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने कांग्रेस पर तंज कसते हुए पूछा कि दशकों तक सत्ता में रहने के दौरान कांग्रेस को कांशीराम की याद क्यों नहीं आई? दूसरी ओर, मायावती ने अपने समर्थकों को आगाह करते हुए कहा कि ये पार्टियां बसपा को खत्म करने की सोची-समझी रणनीति के तहत काम कर रही हैं। उन्होंने चमचा युग पुस्तक का जिक्र करते हुए विपक्षी दलों के साथ जुड़े दलित नेताओं को भी आड़े हाथों लिया। उत्तर प्रदेश में एक साल बाद होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले कांशीराम के सम्मान को लेकर शुरू हुआ यह विवाद आने वाले दिनों में और गहराने के आसार हैं।
