दिल्ली (माधव एक्सप्रेस/ ऊषा माहना) : मिथिला की सुपुत्री और दरभंगा राजपरिवार की तेजस्विनी विभूति महारानी काम सुंदरी देवी (कल्याणी) का निधन हो गया,जो दरभंगा राज परिवार की अंतिम जीवित महिला थीं, वे सादगी, करुणा और गरिमा की प्रतीक थीं। उनका जीवन राजपरंपरा के साथ-साथ मानवीय मूल्यों को समर्पित था। उनके निधन से समाज में एक बड़ी रिक्तता उत्पन्न हुई है। डॉ. राघव नाथ झा ने बताया कि
माघ कृष्ण नवमी, स्वाति नक्षत्र, सनातन कालगणना में तिथि और नक्षत्र केवल पंचांग की प्रविष्टि नहीं होते, बल्कि महापुरुषों और महापुरुषाओं के जीवन-प्रस्थान को विशेष दैवी अर्थ प्रदान करते हैं। इसी पावन संयोग में, ब्रह्ममुहूर्त प्रातः लगभग तीन बजे, मिथिला की सुपुत्री और दरभंगा राजपरिवार की तेजस्विनी विभूति महारानी काम सुंदरी देवी (कल्याणी) ने नश्वर देह का परित्याग किया।
सनातन परंपरा में ब्रह्ममुहूर्त में देह-त्याग को दुर्लभ सौभाग्य माना गया है। यह योग उन्हीं को प्राप्त होता है, जिनका जीवन सेवा, त्याग, संयम और लोककल्याण को समर्पित रहा हो। महारानी कल्याणी देवी का संपूर्ण जीवन इसी साधना का प्रमाण रहा।
नाम नहीं, एक दर्शन थीं ‘कल्याणी’
सामान्य जन उन्हें “सुंदरी देवी” के नाम से जानते थे, किंतु उनका कृतित्व उन्हें “कल्याणी” के रूप में प्रतिष्ठित करता है। उनके नाम से संचालित कल्याणी फाउंडेशन आज भी बिना प्रचार-प्रसार, शांत और गरिमामयी ढंग से समाजसेवा के कार्यों में संलग्न है। यह फाउंडेशन राजपरिवार की उस परंपरा का जीवंत उदाहरण है, जहाँ सेवा को प्रदर्शन नहीं, बल्कि कर्तव्य माना गया।
दरभंगा राजपरिवार: इतिहास नहीं, जीवित परंपरा
दरभंगा राजपरिवार केवल एक ऐतिहासिक राजवंश नहीं रहा है। लगभग चार सौ वर्षों से अधिक समय तक इस वंश ने मिथिला की शिक्षा, संस्कृति, धर्म और राष्ट्रहित के लिए स्वयं को समर्पित रखा।
चीन युद्ध के समय देश को लगभग 600 किलोग्राम स्वर्ण का दान भारतीय इतिहास का ऐसा उदाहरण है, जो आज भी राष्ट्रीय स्मृति का हिस्सा है। शिक्षा, धर्म और समाजसेवा से जुड़े असंख्य संस्थान ऐसे हैं, जिनके पीछे दरभंगा राजपरिवार की प्रेरणा, संरक्षण या दान न रहा हो।
महारानी कल्याणी देवी ने इसी परंपरा को अपने जीवन में आत्मसात किया और मौन साधना के रूप में आगे बढ़ाया।
शिक्षा, संस्कार और सेवा की अविराम साधना
महारानी साहिबा का जीवन शिक्षा, विद्वानों के संरक्षण, छात्रों के हित और सामाजिक समरसता को समर्पित रहा। उन्होंने मंचों से भाषण नहीं दिए, किंतु उनके कार्य स्वयं समाज से संवाद करते रहे।
आज उनके पश्चात भी यह परंपरा जीवित है। राजकुमार कपिलेश्वर सिंह उसी गरिमा और दायित्व-बोध के साथ सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक उत्तरदायित्वों का निर्वहन कर रहे हैं। अयोध्या श्रीराम मंदिर जैसे राष्ट्रीय महत्व के आयोजनों में उनकी सक्रिय सहभागिता इस बात का प्रमाण है कि दरभंगा राजपरिवार लोकतांत्रिक भारत में भी अपने दायित्वों को अधिकार नहीं, कर्तव्य के रूप में निभा रहा है।
राजकीय सम्मान नहीं, प्रश्न फिर भी शेष
महारानी काम सुंदरी देवी की अंतिम विदाई राजकीय सम्मान के बिना हुई। यह पीड़ा केवल एक परिवार की नहीं, बल्कि संपूर्ण मिथिला की सामूहिक वेदना है।
यह प्रश्न आज भी समाज के सामने खड़ा है कि यदि महाराज दरभंगा को भारत रत्न से सम्मानित किया जाता है, तो वह किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि बिहार-मिथिला के गौरव और इतिहास का सम्मान होगा। लोकतांत्रिक भारत में यह आज भी संभव है।
एक शांत विदाई, जो इतिहास बन गई
महारानी कल्याणी देवी का ब्रह्ममुहूर्त में गमन उनके जीवन की ही तरह शांत, गरिमामयी और आत्मदीप्त रहा।
वे कोई मांग नहीं छोड़ गईं, पर जाते-जाते समाज और शासन के सामने एक मौन प्रश्न अवश्य रख गईं—
क्या हम अपने त्यागशील इतिहास को केवल स्मृतियों तक सीमित रखेंगे, या उसे सम्मान और विरासत बनाकर आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनाएँगे?
आज मिथिला शोक में है, पर गर्व से भी भरी है—
क्योंकि कल्याणी जैसी विभूतियाँ बार-बार जन्म नहीं लेतीं।
