डॉ.महेन्द्र यादव की पाती थोड़ी जज़्बाती

कवि सम्मेलन केवल शब्दों का मेल नहीं, वह संस्कृति का उत्सव है, संवेदना का संगम है और साहित्यिक चेतना का जीवंत रूप है। ऐसे आयोजन यदि ‘टेंडर प्रक्रिया’ अथवा ‘इवेंट कंपनियों’ के हवाले कर दिए जाएं, तो यह एक खतरनाक परंपरा की शुरुआत मानी जाएगी — एक ऐसी परंपरा जो “सांवरिया सेठ” जैसी घटनाओं को जन्म देती है, जहां न साहित्य का मान बचता है, न कवियों का सम्मान।
इवेंट कंपनियाँ, जिनका उद्देश्य केवल लाभ कमाना होता है, इस प्रकार के आयोजनों को एक व्यापारिक सौदे की तरह देखती हैं। वे चार परिचित कवियों से संपर्क करती हैं और उन्हें बताते हुए कहती हैं कि आयोजन का बजट केवल चार लाख रुपये है, जबकि वास्तव में आठ लाख रुपये का टेंडर भरा जा रहा होता है। वे उन कवियों से 10 से 15 नामों की एक सूची मांगते हैं — नामों के साथ मानदेय भी जोड़ने को कहा जाता है। कवि, साहित्य के प्रेम में डूबे, सरल हृदय से अपनी सूची सौंप देते हैं, unaware कि उनके साथ एक षड्यंत्र रचा जा रहा है।
इसके पश्चात इवेंट कंपनी चतुराई से उन चारों सूचियों का विश्लेषण करती है और सबसे कम मानदेय वाले दो-दो नाम प्रत्येक सूची से चुन लेती है। फिर उसी कवि को बताया जाता है कि आपकी सूची से केवल दो नाम चयनित हुए हैं। इस तरह, आठ लाख रुपये के टेंडर में से दो लाख की ‘सेटिंग’ होती है, दो लाख इवेंट कम्पनी की जेब में चले जाते हैं, और शेष रकम से कवियों को मात्र पाँच, दस या बीस हजार का ‘सम्मान’ देकर विदा किया जाता है।
यह केवल कवियों के साथ अन्याय नहीं, बल्कि साहित्य के प्रति एक प्रकार की बेईमानी है। इस प्रक्रिया ने कवि सम्मेलनों की गुणवत्ता को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। जब कविता का मंच सच्चे साहित्यकारों से नहीं, बल्कि सस्ते और सुविधा-सुलभ विकल्पों से भरे जाएंगे, तो श्रोता भी स्वाभाविक रूप से ऐसे आयोजनों से दूरी बनाने लगेंगे।
अतः यह अत्यंत आवश्यक है कि कवि सम्मेलन का संयोजन किसी प्रतिष्ठित, साहित्यप्रेमी और अनुभवी कवि को सौंपा जाए — जो अपने नगर के साहित्यिक मिज़ाज को जानता हो, जो कविता की आत्मा को समझता हो, और जो इस आयोजन को ‘इवेंट’ नहीं, बल्कि ‘अनुभव’ के रूप में प्रस्तुत कर सके।
कविता बाजार नहीं, आत्मा की अभिव्यक्ति है। उसे सौदेबाज़ी से बचाना हम सबकी सामूहिक ज़िम्मेदारी है।
