साल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशनऑफ इंडिया (SEA) नेपुनर्योजी उत्पादों के खरीदी की घोषणा की
भोपाल/इंदौर, मध्य प्रदेश –अगस्त 2025 –भारत के खाद्य तेल क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए अग्रणी उद्योग संघ, अनुसंधान संस्थानों, सरकारी निकायों और नागरिक समाज संगठनों ने मिलकरनेशनल एलायंस फॉर रीजेनेरेटिव वेजिटेबल ऑयल सेक्टर (नारवोस)का गठन भोपाल में किया है।कार्यक्रम में साल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशनऑफ इंडिया (SEA) ने अपने 800 सदस्य कंपनियों के साथ मिलकर पुनर्योजी उत्पादों की खरीद (बायबैक) के लिए प्रतिबद्धता की घोषणा की।सॉलिडरिडाड द्वारा संचालित यह मंच पुनर्योजी कृषि को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देगा, जिससे मिट्टी का स्वास्थ्य सुधरेगा, उत्पादकता बढ़ेगी और किसान जलवायु परिवर्तन से बेहतर तरीके से निपट सकेंगे। यह पहलईयू–भारत साझेदारीके अंतर्गत शुरू की गई है, जिसका उद्देश्य जलवायु–लचीली खाद्य प्रणालियों, टिकाऊ मूल्य श्रृंखला और किसान–केन्द्रित नवाचारों को प्रोत्साहित करना है।
इस गठबंधन मेंसॉल्वेंट एक्स्ट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA), ए.डब्ल्यू.एलएग्री बिजनस,सोपाऔरभारतीय मृदा विज्ञान संस्थान (IISS)जैसे प्रमुख निकाय शामिल हैं। यह पहल भारत की खाद्य तेल आयात पर निर्भरता घटाने, किसानों की आजीविका सुधारने और देश को टिकाऊ वनस्पति तेलों में वैश्विक नेतृत्व दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण है।
वर्तमान में भारत अपनी लगभग 60% खाद्य तेल आवश्यकता आयातसे पूरी करता है, जिस पर सालाना ₹1.5 लाख करोड़ (18 अरब अमेरिकी डॉलर)से अधिक खर्च होता है। वहीं, अस्थिर कृषि पद्धतियों और मिट्टी की उर्वरता घटने से 2.7 करोड़ हेक्टेयर में तिलहन उत्पादन की स्थिरता खतरे में है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थानके अनुसार भारत की 55% से अधिक भूमि पहले से ही क्षरित हो चुकी है, ऐसे में प्रकृति–सकारात्मक समाधान समय की आवश्यकता बन गए हैं।पुनर्योजी कृषिइस दिशा में ठोस विकल्प है। कम जुताई, आवरण फसलें, सहफसली खेती और जैविक खाद–कम्पोस्ट उपयोग जैसी तकनीकों से उपज में 20–40% वृद्धिऔर रासायनिक लागत में 50% तक कमीकी संभावना सिद्ध हो चुकी है। यह बदलाव सोयाबीन, सरसों, मूंगफली, सूरजमुखी और पाम ऑयल जैसी तिलहन फसलों के लिए लाभकारी साबित हो सकता है।
श्री अंग्शु मलिक, उपाध्यक्ष, सॉल्वेंट एक्स्ट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडियाने कहा“भारत अपने खाद्य तेल क्षेत्र की यात्रा के एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। एक ओर हम दुनिया के सबसे बड़े आयातक हैं और हर वर्ष ₹1.5 लाख करोड़ से अधिक विदेशी तेल आयात पर खर्च करते हैं, जिससे हमारी खाद्य सुरक्षा वैश्विक बाज़ार की अस्थिरताओं पर निर्भर हो जाती है। दूसरी ओर हमारे किसान घटती उत्पादकता और मृदा स्वास्थ्य की गंभीर चुनौतियों से जूझ रहे हैं। पुनर्योजी कृषि हमें एकमार्गप्रदान करती है। इस गठबंधन के माध्यम से यदि हम साथ मिलकर कार्य करें तो भारत न केवल आत्मनिर्भर बन सकता है बल्कि टिकाऊ वनस्पति तेलों में वैश्विक नेतृत्व भी स्थापित कर सकता है।”
सॉल्वेंट एक्स्ट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA)के विशेष सलाहकार श्री अतुल चतुर्वेदी ने बताया किआज समय की मांग है कि हमें किसानों का उत्पादन तो बढ़ाना ही है साथ ही खेती को लंबे समय तक टिकाऊ बनाने और मिट्टी को उपजाऊ रखने के उपाये भी सोचनेहोंगे। इसलिए हम सब पुनर्योजी खेती के लिए साथ आए हैं। आने वाले समय में कृषि से जुड़ा हर संगठन और कंपनी इससे जुड़े यह हमारा प्रयास है।
डॉ. मनोरंजन मोहंती, निदेशक, आईआईएसएस ने कहा:”आज कृषि क्षेत्र में मृदा स्वास्थ्य सबसे गंभीर चिंता है। मृदा क्षरण की बढ़ती समस्या एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आ रही है। ऐसे में मृदा स्वास्थ्य को सुधारने और बनाए रखने पर केंद्रित पहल कृषि के सशक्त और टिकाऊ भविष्य के लिए अत्यंत आवश्यक है।”
डॉ. सुरेश मोटवानी, कार्यक्रम संयोजक सॉलिडरिडाड ने बताया कि “पुनर्योजी कृषि केवल एक पद्धति नहीं है, बल्कि यह खेती का एक दर्शन है, जो प्रकृति के साथ मिलकर काम करता है, उसके विरुद्ध नहीं। लंबे समय तक हमारी कृषि प्रणाली ने अल्पकालिक लाभों पर ध्यान केंद्रित किया, जिसके परिणामस्वरूप मृदा का ह्रास, बढ़ती लागत और जलवायु जोखिम सामने आए, जिनका सबसे अधिक खामियाज़ा हमारे किसानों को भुगतना पड़ा। इस गठबंधन के माध्यम से हम उद्योग, अनुसंधान, सरकार और नागरिक समाज को एक मंच पर ला रहे हैं ताकि ऐसी सामूहिक रणनीतियाँ बनाई जा सकें”।
डॉ. बी.वी. मेहता, कार्यकारी निदेशक – सॉल्वेंट एक्स्ट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) ने कहा: “भारतीय वनस्पति तेल क्षेत्र हमारे खाद्य अर्थतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है, लेकिन आज भी इसमें माँग और आपूर्ति के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है। भारत लाखों हेक्टेयर भूमि पर विविध तिलहनों की खेती करता है, फिर भी हमारी उत्पादकता वैश्विक मानकों से काफी पीछे है। इस अंतर को पाटने के लिए हमें नवाचार, सहयोग और टिकाऊ मॉडल अपनाने की आवश्यकता है। इसे सुदृढ़ करने के लिए, एसईए अपनी 800 सदस्य कंपनियों के साथ मिलकर पुनर्योजी उत्पादों की पुनर्खरीद के लिए प्रतिबद्धहै।
श्री विजया दाता, अध्यक्ष, एसईए-रेप मस्टर्ड प्रमोशन काउंसिल”सरसों भारत की प्रमुख तिलहन फसल है, जिसे मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान के लाखों लघु किसान उगाते हैं। फिर भी हमारी औसत पैदावार वैश्विक मानकों की आधी से भी कम है। पुनर्योजी कृषि हमें इस समीकरण को बदलने का अवसर प्रदान करती है। मृदा स्वास्थ्य को बहाल करके, जल दक्षता में सुधार लाकर और फसल प्रणालियों में विविधता लाकर हम उत्पादकता बढ़ा सकते हैं और साथ ही किसानों की लागत घटा सकते हैं। देश के लिए एक अधिक लचीले और टिकाऊ वनस्पति तेल क्षेत्र के निर्माण में एसईएअन्य हितधारकों के साथ खड़ा होने पर गर्व महसूस करता है।”
