डॉ. महेन्द्र यादव की पाती थोड़ी जज्बाती

जैसे ही यह मनहूस खबर मिली कि अरुण वर्मा अब हमारे बीच नहीं रहे, वह भी हृदयाघात जैसी अचानक आई विपदा के कारण—मन जैसे थम-सा गया, दिमाग सुन्न पड़ गया। शब्द रुंध गए, और यह विश्वास करना कठिन हो गया कि वह चेहरा, जो हर आयोजन की जान हुआ करता था, अब केवल यादों में रह गया है।
अरुण वर्मा जैसी शख्सियतें विरले ही जन्म लेती हैं। वे सिर्फ एक नाम नहीं थे, बल्कि एक विचारधारा, एक आंदोलन और युवाओं की आवाज़ थे। उनका जीवन नेतृत्व, समर्पण और संघर्ष की मिसाल था। उज्जैन जैसे सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से जागरूक शहर में अरुण वर्मा ने जो छवि बनाई, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक आदर्श बनी रहेगी।
मुझे आज भी माधव कॉलेज के वे दिन याद हैं, जब अरुण वर्मा ने भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (NSUI) के शहर अध्यक्ष के रूप में कार्यभार संभाला था। उनका नेतृत्व सिर्फ पद तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने छात्र राजनीति को एक नई दिशा दी। जिस दमदारी, साहस और रणनीतिक समझ के साथ उन्होंने NSUI को उज्जैन में खड़ा किया, वह किसी भी छात्र नेता के लिए प्रेरणा है। उनके पहले और उनके बाद, शायद ही कोई ऐसा प्रभावशाली नेतृत्व सामने आया हो, जिसने इतनी गहरी छाप छोड़ी हो।
उनके नेतृत्व में छात्र संगठन एक सशक्त मंच बना, जो हर छात्र की समस्या को अपना समझता था। चाहे विक्रम विश्वविद्यालय से जुड़ी परीक्षाओं की गड़बड़ियाँ हों, कॉलेजों में फीस से जुड़ी समस्याएं, या एडमिशन प्रक्रिया में होने वाली कठिनाइयाँ—अरुण वर्मा हर मुद्दे पर न सिर्फ मुखर थे, बल्कि सक्रिय रूप से समाधान में जुटे रहते थे। उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी—24 घंटे उपलब्ध रहना। दिन-रात कोई फर्क नहीं पड़ता था; यदि किसी छात्र को परेशानी है, तो अरुण वर्मा खड़े मिलते थे।
लेकिन अरुण वर्मा की पहचान सिर्फ छात्र राजनीति तक सीमित नहीं थी। उन्होंने शहर को सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में भी एक नई ऊर्जा दी। देवास गेट पर होने वाला रंग पंचमी महोत्सव उनकी सोच, सृजनशीलता और संगठन क्षमता का ऐसा उदाहरण है, जिसे उज्जैन कभी भूल नहीं सकता।
रंग पंचमी, जो पहले एक पारंपरिक उत्सव मात्र थी, उसे अरुण वर्मा ने एक भव्य सार्वजनिक पर्व में बदल दिया। डीजे की धमक, रंगों की बौछार, कड़ाव में डुबकी, हजारों युवाओं की भागीदारी और बेहतरीन स्वल्पाहार की व्यवस्था—यह सब उनके कुशल प्रबंधन और दूरदर्शिता का ही परिणाम था। उज्जैन के नागरिकों के लिए रंग पंचमी का मतलब देवास गेट का आयोजन बन गया, और यह आयोजन अरुण वर्मा के नाम से जुड़ गया।
हर साल इस दिन वे स्वयं व्यवस्था की कमान संभालते, कार्यक्रम के हर हिस्से में मौजूद रहते और इस बात का विशेष ध्यान रखते कि कोई असुविधा न हो। यही समर्पण उन्हें भीड़ से अलग करता था। यही वजह है कि वे हर वर्ग, हर आयु और हर विचारधारा के लोगों में समान रूप से लोकप्रिय थे।
आज अरुण वर्मा हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी यादें, उनके कार्य और उनका व्यक्तित्व हर उस व्यक्ति के मन में जीवित रहेगा, जिसने उन्हें करीब से देखा, जाना या महसूस किया। उनके जाने से जो शून्य उत्पन्न हुआ है, वह केवल एक नेता का नहीं, बल्कि एक सच्चे कर्मयोगी, एक समाजसेवी, और एक प्रेरणादायी व्यक्तित्व का है।
आज हम भारी मन से उन्हें अंतिम विदाई दे रहे हैं। शब्द कम पड़ रहे हैं, लेकिन दिल से यही निकल रहा है—“अरुण वर्मा, आप हमारे दिलों में सदा जीवित रहेंगे।”
विनम्र श्रद्धांजलि।
आपकी स्मृतियों को नमन।
