
डॉ. महेन्द्र यादव की पाती थोड़ी जज्बाती
वक्त बदल गया है, पर यादें अब भी वैसी ही ताजा हैं। उस दौर की बात ही कुछ और थी जब सुबह-सुबह अखबार हाथ में आते ही सबसे पहले आखरी पन्ने पर नजर जाती थी। जी हां, अखबार उल्टी तरफ से शुरू होता था, क्योंकि हमें फिल्मों के विज्ञापन देखने की जल्दी रहती थी। कौन-सी फिल्म कहां लगी है? हीरो-हीरोइन कौन हैं? विलेन किस रूप में आएगा? इन सवालों के जवाब जानने की उत्सुकता हमें उस आखिरी पन्ने से जोड़ती थी।
वो सुनहरे दिन और सिनेमा की दीवानगी
उस दौर में सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं था, वह एक अनुभव था, एक उत्सव था। उज्जैन में सिनेमा हॉल की भरमार थी, और हर हॉल की अपनी एक अलग पहचान थी। कैलाश टॉकीज बंबाखाना की गूंज हो या रीगल टॉकीज गोपाल मंदिर की रौनक, कमल टॉकीज दूधतलाई की भीड़ हो या प्रकाश टॉकीज नई सड़क की चमक, मोहन टॉकीज का आकर्षण हो या मेट्रो टॉकीज की शान, हर जगह सिनेमा का जादू सिर चढ़कर बोलता था।
नई फिल्म के रिलीज होते ही टिकट खिड़की पर लंबी-लंबी कतारें लग जाती थीं। लोग घंटों धूप में खड़े रहते, सिर्फ इसलिए कि उन्हें पहले ही दिन पहला शो देखना है। टिकट मिलना किसी विजय से कम नहीं होता था, और अगर ब्लैक में भी टिकट मिल जाए तो खुद को किस्मतवाला समझा जाता था।
फिल्मों का रोमांच और बेमिसाल यादें
अखबार के उस पन्ने में सिर्फ फिल्मों के नाम और उनके पोस्टर नहीं होते थे, उसमें हमारी उम्मीदें, हमारी कल्पनाएं और हमारे सपने बसे होते थे। हीरो की स्टाइल को अपनाना और हीरोइन की खूबसूरती की चर्चा करना, ये सब उसी पन्ने से शुरू होता था। जब दोस्त मिलते थे, तो सबसे पहले यही सवाल होता था – “कौन सी फिल्म लगी है?”
स्वर्ग सुंदरम इंदौर रोड की रंगीनियत, अशोक टॉकीज फ्रीगंज की गूंज, भतवाल टॉकीज तीनबत्ती चौराहा की चमक, और निर्मल सागर निकास चौराहा की खासियत – हर जगह की अपनी कहानी थी। त्रिमूर्ति टॉकीज बहादुर गंज में और कंठाल चौराहा के समीप नरेन्द्र टॉकीज में बैठकर फिल्म देखते वक्त जो रोमांच महसूस होता था, वो आज मल्टीप्लेक्स की आरामदायक कुर्सियों में कहीं खो गया है।
सिनेमा के साथ बदलता वक्त
वो समय था जब एक फिल्म को लेकर पूरे शहर में चर्चा होती थी। हर गली-मोहल्ले में उसकी कहानियां बुनी जाती थीं। लेकिन आज वह दीवानगी कहीं खो गई है। ओटीटी प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन बुकिंग ने वह लाइनें खत्म कर दी हैं, जिनमें लोग घंटों खड़े रहकर टिकट लेते थे।
अब उज्जैन में सभी टॉकीज बंद हो चुके हैं। कुछ खंडहर पड़े हैं तो कुछ को तोड़कर वहां बड़े-बड़े मार्केट बना दिए गए हैं। सिंगल स्क्रीन सिनेमा अब बीते हुए कल का हिस्सा बन चुका है। उनकी जगह मल्टीप्लेक्स ने ले ली है, जो आधुनिक तकनीक और सुविधाओं से लैस हैं। फ़िल्म देखने का जरिया अब उज्जैन में एकमात्र ‘ट्रेजर बाजार मॉल’ में मल्टीप्लेक्स है। वह दौर जब हर गली में टॉकीज की रौनक थी, अब सिर्फ यादों में सिमट कर रह गया है।
भूली-बिसरी यादें
वो दौर सच में कुछ और था। वह समय सिर्फ फिल्मों का नहीं, बल्कि भावनाओं का था। हीरो की एंट्री हो या पसंदीदा गाने का सीन, पर्दे पर चिल्लर फेंकना जैसे उस खुशी को और भी बढ़ा देता था। वह चिल्लर फेंकना महज एक शरारत नहीं थी, बल्कि उसमें हमारी दीवानगी और उत्साह झलकता था।
जोर-जोर से सीटी बजाना, हर डायलॉग पर तालियों की गड़गड़ाहट, और जब हीरो विलेन को पटकता था, तो जैसे पूरे सिनेमा हॉल में जोश भर जाता था। वह तालियों की गूंज, वो सीटियों की धुन, और वो हंसी-मजाक, सब कुछ आज भी मन-मस्तिष्क में बसा हुआ है।
उस समय फिल्म देखना एक सामाजिक अनुभव था। दोस्त, पड़ोसी, रिश्तेदार – सभी साथ जाते थे। बालकनी की टिकट खरीदने का गर्व और फर्स्ट क्लास में बैठकर फिल्म देखने का आनंद – यह सब अब सिर्फ यादें बनकर रह गया है।
आज भले ही मल्टीप्लेक्स में आलीशान कुर्सियां, एसी की ठंडक और डिजिटल साउंड क्वालिटी हो, लेकिन वह जोश, वह जुनून, और वह तालियों की गूंज अब कहीं नहीं मिलती।
वो दौर सच में कुछ और था। वो पन्ने, वो लाइनें, वो टिकट और वो हॉल… सब कुछ जैसे बीते वक्त का हिस्सा बन गए हैं। पर यादें अब भी वही हैं। आज भी जब उन सिनेमा हॉल के सामने से गुजरते हैं, तो मन में एक टीस उठती है। लगता है जैसे कहीं से आवाज आएगी – “भैया, दो टिकट देना!”
शायद वक्त के साथ सब बदल जाए, पर वो सुनहरा दौर हमेशा हमारे दिलों में जिंदा रहेगा। वो दौर, जब अखबार उल्टी तरफ से शुरू होता था…!
