डॉ.महेन्द्र यादव की पाती थोड़ी जज्बाती
होली की शाम थी।
गली में रंगों की बहार थी, ढोल-नगाड़ों की गूंज हर ओर थी। घर में गुजिया और ठंडाई की खुशबू फैली हुई थी। पूरे मोहल्ले में रंग खेलने का उत्साह था। तभी आठ वर्षीय बेटा दौड़ता हुआ घर में आया और उसके पीछे-पीछे एक हमउम्र बच्चा। माँ ने उसे देखा और मुस्कुराकर पूछा,
“बेटा, यह कौन है?”
बेटा खुशी से बोला, “माँ, यह मेरा दोस्त है!”
माँ ने स्नेह से सिर थपथपाया और कहा, “बेटा, तेरे पापा के भी एक दोस्त हैं। भाई से भी बढ़कर थी उनकी दोस्ती। उनके किस्से आज भी मशहूर हैं।”
इतना सुनते ही पास बैठे पिता ने टोका, “लेकिन बेटे को यह भी बता दो कि पिछले तीन साल से उस दोस्त ने हमारी कोई ख़ैर-ख़बर तक नहीं ली। एक फोन तक नहीं किया!”
पत्नी ने प्यार से कहा, “अरे, उन्होंने नहीं किया तो आप ही कर लीजिए।”
पति तुनककर बोला, “हर बार मैं ही क्यों करूँ? इस बार मैं नहीं करूँगा!”
तभी मोबाइल की घंटी बजी।
स्क्रीन पर नाम चमका— वही दोस्त, जिसके बारे में अभी-अभी चर्चा हो रही थी।
पति झुंझलाकर बोला, “देखो, उसका फोन आ रहा है। मैं बात नहीं करूँगा, तुम कर लो!”
पत्नी ने फोन उठाया, उधर से आवाज आई—
“नमस्ते भाभीजी!”
पत्नी ने तपाक से कहा, “भैया, आप कहाँ हैं? कितने दिनों से कोई खबर ही नहीं!”
उधर से धीमी, लेकिन गहरी आवाज आई—
“भाभीजी, मैं आपके घर के दरवाजे पर खड़ा हूँ।”
पत्नी चौंक गई। फोन काटकर पति से बोली, “भैया दरवाजे पर हैं, उन्हें अंदर लाओ।”
पति बड़बड़ाते हुए दरवाजे तक गया, “गेट तक आ सकता है, घर के अंदर नहीं आ सकता?”
दरवाजा खुला… और जो सामने देखा, उसने मानो समय रोक दिया।
व्हीलचेयर पर बैठा दोस्त… दोनों पैर कटे हुए! वह अवाक् रह गया।
“अरे यार, ये क्या हुआ?”
दोस्त ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया, “तीन साल पहले एक एक्सीडेंट में दोनों पैर चले गए।”
गला सूखने लगा, शब्द रुकने लगे, उसने काँपती आवाज़ में पूछा, “तूने बताया क्यों नहीं?”
दोस्त धीरे से बोला, “छह महीने कोमा में रहा, फिर होश आया।”
आँखों में नमी उतर आई, “लेकिन होश में आने के बाद भी तूने मुझे क्यों नहीं बताया?”
दोस्त का जवाब दिल चीर देने वाला था—
“यार, तूने भी तो नहीं पूछा ना…”
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सीख:
हम अक्सर अपने मन में धारणाएँ बना लेते हैं और बिना सच जाने ही निर्णय कर लेते हैं। हम सोचते हैं कि सामने वाला बदल गया है, अहंकारी हो गया है, हमसे दूर चला गया है। लेकिन यह कभी नहीं सोचते कि शायद वह किसी बड़ी परेशानी से जूझ रहा हो।
दोस्ती और रिश्ते एकतरफा नहीं चलते। अगर कोई अपनों से दूर है, तो यह जानने की कोशिश करनी चाहिए कि उसकी मजबूरी क्या है। किसी के इंतज़ार में बैठे रहने से अच्छा है कि एक बार खुद ही हालचाल पूछ लिया जाए। क्या पता, दूसरी तरफ कोई अपनों की उम्मीद में दर्द से अकेला लड़ रहा हो…!
