मन की समस्याओं से बाहर निकलना है तो मैं और मेरा से ऊपर उठकर देखना पड़ेगा।
आश्चर्यजनक बात यह है कि ‘मैं’ को छोड़कर ही ‘मैं’ को पाया जाता है….. अध्यात्म जब अहंकार को छोड़ने की बात करता है, उस समय वह मनुष्य को उससे बड़ी शक्ति से जोड़ रहा होता। यह शक्ति गुरु, ईश्वर, ईष्ट ही हो सकते हैं।
रात को सोते हुए फोन पर अलार्म सबने लगाया है जिससे कि अलार्म बजे एवं हम नींद से जग जाएं। अलार्म का स्वर जब पूर्व निर्धारित समय में बजता है तब वह स्वर किसे सुनाई देता है? अधमूंदी स्थिति में हम सोचते हैं कि कही दूर से आवाज आ रही हैं एवं फिर चैतन्य हो जाते हैं। चैतन्यता अहम् है, अपनी रक्षा करना अहं भाव है।
‘मैं हूं जो कर रहा हूं।’ यह भाव अहंकार है या सत्य? यदि कार्य हो रहा है तो उसका एक कर्ता अवश्य होगा? उस कर्त्तापन…
अपने आप में खुश रहिये….
आप खुश होंगे, अमृत से भरे हुए होंगे तभी तो आप खुशी और अमृत बांट सकेंगे…अपने भीतर के अमृत का अवगाहन कीजिये और पूर्णता के साथ जीवन जीयें…पूर्णता का अर्थ है कुछ भी अधूरा नहीं।साधना करनी है पूर्णता के साथ, कार्य करना है – पूर्णता के साथ, प्रेम करना है पूर्णता के साथ, भक्ति करनी है- पूर्णता के साथ…करते रहिये, पूर्णता के साथ ।वेद शास्त्र लिखे गए, काव्य रचे गए, इमारतें बनाई गए जिससे कि आने वाले पीढ़ी जान सके कि वे कभी थे एवं जिन्होंने इन महान कामों को किया। इतिहास में नाम लिख देना ‘मैं हूं’ के भाव का ही मुखर रूप है।
अहंकार हमारी उपस्थिति को दर्ज कराने की अभिव्यक्ति है, तब फिर धर्म इसके विरुद्ध क्यों है? धर्म उपदेश क्यों देता है कि अहंकार को छोड दो। अहंकार को यदि छोड दिया गया, जीने की इच्छा नहीं बची कि मैं हूं, तब शास्त्र, धर्म किस काम के ?
जब मैं था तब हरि नहीं…
अब हरि हैं मैं नांहि…
धर्म यह उपदेश देता है क्योंकि अध्यात्म पथ में सबसे बड़ी बाधा ‘मैं’ है। मैं को खोए बिना ध्यान के दूसरे स्तर पर नहीं जाया जा सकता है। समस्या है कि ‘मैं’ ऐसा चिपक गया है कि हम उसे खोना नहीं चाहते हैं। सुबह उठ कर जगते ही मैं सामने आ जाता है। ‘मैं’ भी अकेला कहां है? मैं हमारे हजारों लाखों अनुभवों का निचोड़ में हैं उन अनुभवों से ‘मैं’ निर्मित हुआ है।
जब हम ध्यान करने बैठते हैं उस समय ‘मैं’ सामने खड़ा हो जाता है। जब हम पूजा-आराधना के लिए बैठते हैं उस समय भी ‘मैं’ मौजूद होता है। मन्दिर में प्रार्थना करने जाओ वहां भी ‘मैं’ विराजमान है।
