बिहार में उच्च शिक्षा की चर्चा जब भी होती है, विश्वविद्यालयों और अंगीभूत महाविद्यालयों का उल्लेख प्रमुखता से किया जाता है। इसी व्यवस्था के समानांतर दशकों से एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था भी चल रही है, जिसने सीमित संसाधनों के बावजूद लाखों विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा का अवसर उपलब्ध कराया है। ये हैं बिहार के संबद्ध डिग्री महाविद्यालय, जिन्हें लंबे समय से वित्त रहित शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा माना जाता रहा है। इन महाविद्यालयों की कहानी केवल कुछ संस्थानों की कहानी नहीं है। यह उन लाखों विद्यार्थियों और परिवारों की कहानी है, जिनके लिए पटना, गया, मुजफ्फरपुर, भागलपुर या किसी दूसरे बड़े शहर में जाकर पढ़ाई करना आर्थिक रूप से संभव नहीं था।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब इन महाविद्यालयों में विद्यार्थी पढ़ रहे हैं, परीक्षाएं हो रही हैं, डिग्रियां मिल रही हैं और राज्य की उच्च शिक्षा व्यवस्था में इन संस्थानों की भूमिका बनी हुई है तो वहां काम करने वाले शिक्षकों और शिक्षकेतर कर्मचारियों की आर्थिक सुरक्षा स्थायी क्यों नहीं होनी चाहिए? सरकार को यह विचार करना होगा कि शिक्षा का काम यदि महत्वपूर्ण और स्थायी है तो उससे जुड़े मानव संसाधन को अस्थायी आर्थिक व्यवस्था में कब तक रखा जा सकता है?
220 कॉलेज, लगभग 10 लाख विद्यार्थी
बिहार में लगभग 220 संबद्ध डिग्री महाविद्यालयों और उनसे जुड़े लगभग 10 लाख विद्यार्थियों का आंकड़ा इस विषय की गंभीरता को समझने के लिए पर्याप्त है। यह केवल 220 संस्थानों की संख्या नहीं है। इनके पीछे हजारों शिक्षक और शिक्षकेतर कर्मचारी हैं तथा लाखों परिवारों की उम्मीदें जुड़ी हुई हैं।
अनुदान बनाम वेतनमान
वित्त रहित संस्थानों की सबसे महत्वपूर्ण समस्याओं में से एक अनुदान और नियमित वेतनमान के बीच का अंतर है। कर्मचारियों की मांग है कि उन्हें ऐसी व्यवस्था मिले जिससे उनका जीवन आर्थिक असुरक्षा से बाहर निकल सके। यहां एक गंभीर सवाल भी उठता है, यदि सरकार किसी संस्थान की शैक्षणिक गतिविधियों को मान्यता देती है और उसके विद्यार्थियों को परीक्षा एवं डिग्री की व्यवस्था उपलब्ध कराती है तो वहां कार्यरत शिक्षकों और कर्मचारियों को नियमित वेतनमान और सामाजिक सुरक्षा देने की नीति क्यों नहीं बनाई जा सकती?
अनुदान आधारित व्यवस्था में पारदर्शिता सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बन जाती है। यदि सरकार करोड़ों रुपये का अनुदान देती है तो उसके वितरण और उपयोग की स्पष्ट, सार्वजनिक और ऑडिट योग्य व्यवस्था होनी चाहिए। पैसा किस संस्था को कितना मिला, किस मद में खर्च हुआ और कर्मचारियों तक कितना पहुंचा- इन सभी सवालों का जवाब सार्वजनिक होना चाहिए।
यह आरोप भी सामने आते रहे हैं कि अनुदान की राशि का लाभ कर्मचारियों तक पूरी तरह नहीं पहुंचता और प्रबंधन स्तर पर वित्तीय अनियमितताएं होती हैं, ऐसी शिकायतें लगातार उठती रही हैं तो सरकार को स्वतंत्र और निष्पक्ष ऑडिट कराना चाहिए। दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। सवाल यह भी है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि जिन लोगों को इस व्यवस्था से लाभ मिल रहा है, उनका प्रभाव नीति-निर्माण तक पहुंच रहा हो? यह एक गंभीर लोकतांत्रिक सवाल है और इसका जवाब तथ्यों, पारदर्शिता और जांच के माध्यम से ही मिलना चाहिए, आरोप-प्रत्यारोप के माध्यम से नहीं।