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प्रो. (डॉ.) सुनील गोयल, प्रोफेसर एवं मुख्य सूत्रधार* , ने कहा कि शोध की सफलता केवल प्रकाशित शोध-पत्रों से नहीं, बल्कि पेटेंट, तकनीकी समाधान, क्लिनिकल उपयोग, नीति-निर्माण और नागरिकों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले वास्तविक प्रभाव से मापी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि शोध को प्रयोगशाला से निकालकर समाज और मरीज तक पहुंचाना नीति का मूल लक्ष्य होना चाहिए।
प्रो. (डॉ.) अरुणा कुसुमाकर, प्रोफेसर एवं प्रशासनिक अधिकारी,* ने कहा कि युवा शोधकर्ताओं को अनुसंधान से नवाचार और नवाचार से सामाजिक समाधान तक पहुंचने के लिए संस्थागत सहयोग और उचित मंच उपलब्ध कराया जाना आवश्यक है।