Aaj Ka Rashifal: मेष से मीन तक कई राशियों की चमकेगी किस्मत, जानिए आज का राशिफल
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जंतर-मंतर पर बैठे वे छात्र सिर्फ़ अपने भविष्य के लिए नहीं लड़ रहे, वे उस भरोसे के लिए लड़ रहे हैं जो किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूंजी होता है। वे सड़क पर इसलिए नहीं हैं कि उन्हें शौक़ है धूप, बारिश और धूल में बैठने का। वे इसलिए बैठे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि उनकी आवाज़ सुनने वाला कोई नहीं बचा।
देश के हर माता-पिता की आँखों में एक सपना होता है—बेटा या बेटी पढ़-लिखकर सम्मानजनक जीवन जिए। लेकिन जब वर्षों की मेहनत के बाद भी भर्ती परीक्षाएँ विवादों में घिर जाएँ, परिणाम लटक जाएँ, नियुक्तियाँ रुक जाएँ और युवाओं को बार-बार इंतज़ार ही मिले, तब उनके भीतर उम्मीद से ज़्यादा हताशा जन्म लेने लगती है।
जंतर-मंतर पर बैठे इन छात्रों को देखकर बार-बार एक सवाल मन में उठता है क्या इन्हें किताबों के बीच होना चाहिए था या सड़कों पर? क्या इनके हाथों में कलम होनी चाहिए थी या तख्तियाँ?
लोकतंत्र में विरोध करना अपराध नहीं, बल्कि अधिकार है। लेकिन उससे भी बड़ा कर्तव्य है कि उस विरोध को सुना जाए। हर आंदोलन देश-विरोधी नहीं होता। कई आंदोलन देश को बेहतर बनाने की कोशिश भी होते हैं।
मुझे उन छात्रों की आँखों में गुस्सा कम और दर्द ज़्यादा दिखाई देता है। वे व्यवस्था से लड़ना नहीं चाहते, वे सिर्फ़ इतना चाहते हैं कि उनके साथ न्याय हो। उनका भविष्य किसी फ़ाइल, किसी नोटशीट या किसी तारीख़ के इंतज़ार में न अटक जाए।
आज यदि हम उनकी आवाज़ को अनसुना कर देंगे, तो कल इतिहास हमसे सवाल पूछेगा कि जब देश का युवा अपने अधिकार की बात कर रहा था, तब हम कहाँ थे?
मुझे बार-बार एक पंक्ति याद आती है…
“एक दिन हम सब अपनी-अपनी चुप्पियों को लेकर मर जाएंगे, और हमें अफ़सोस रहेगा… हमें बोलना चाहिए था।”
यह सिर्फ़ छात्रों के आंदोलन की बात नहीं है। यह उस संवेदनशील समाज की परीक्षा है, जो तय करेगा कि वह अपने युवाओं के साथ खड़ा है या उनकी उम्मीदों को टूटते हुए चुपचाप देखता रहेगा।
संवाद किसी भी समस्या का सबसे सुंदर समाधान है। सत्ता और छात्र—दोनों को एक-दूसरे की बात सुननी होगी। क्योंकि जब युवा निराश होता है, तब सिर्फ़ एक व्यक्ति का नहीं, पूरे राष्ट्र का भविष्य कमजोर होता है।
आइए, असहमति को दुश्मनी न बनाएँ, संवाद को रास्ता बनाएँ। क्योंकि एक मज़बूत लोकतंत्र वही है जहाँ सवाल पूछने वालों को सुना जाता है, दबाया नहीं जाता।
— डॉ. महेन्द्र यादव
“डॉ. महेन्द्र यादव की पाती थोड़ी जज़्बाती”
