श्री संजय अग्रवाल प्रदेश अध्यक्ष, वर्ल्ड हिन्दू फेडरेशन, मध्य प्रदेश
NEET-UG 2025 परीक्षा के दौरान देश के विभिन्न केंद्रों पर जो घटनाएं सामने आई हैं, वे केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि हिंदू समाज की आस्था और पहचान पर सीधा प्रहार हैं। सुरक्षा और “एंटी-चीटिंग” के नाम पर हिंदू बेटियों को उनकी नाक की नथ, मंगलसूत्र, तुलसी माला, कलावा और जनेऊ जैसे पवित्र प्रतीकों को जबरन हटाने के लिए मजबूर करना किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं है।
यह केवल एक नियम का पालन नहीं, बल्कि चयनात्मक सख्ती और मानसिक उत्पीड़न का स्पष्ट उदाहरण है।
जमीनी घटनाएं: अपमान और पीड़ा की तस्वीर तमिलनाडु के मदुरै-तिरुमंगलम में छात्राओं को नथ पहनने के कारण परीक्षा में प्रवेश से रोका गया।
कर्नाटक के चिक्कमगलुरु में नथ न निकाल पाने पर छात्राओं के साथ जबरन उपाय किए गए, जिससे उन्हें शारीरिक पीड़ा तक झेलनी पड़ी।
सूरत में एक छात्रा से तुलसी माला उतरवाई गई, जबकि उसके परिजन इसका विरोध करते रहे।
कई केंद्रों पर जनेऊ और कलावा तक उतरवाए गए—जो सीधे धार्मिक हस्तक्षेप की श्रेणी में आता है।
क्या यही है “संवेदनशील प्रशासन”? क्या परीक्षा के नाम पर बेटियों की गरिमा और आस्था को कुचला जाएगा?
धार्मिक प्रतीकों पर दोहरा रवैया क्यों?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ये नियम सभी पर समान रूप से लागू किए जा रहे हैं?
यदि सुरक्षा ही सर्वोपरि है, तो फिर हर प्रकार के धार्मिक प्रतीकों पर समान नीति क्यों नहीं?
आखिर क्यों कुछ प्रतीकों को जांच के बाद अनुमति और कुछ को सीधे प्रतिबंध?
यह स्थिति दोहरे मापदंड और चयनात्मक कार्रवाई की ओर इशारा करती है, जो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वीकार्य नहीं हो सकती। नथ और अन्य प्रतीक: केवल आभूषण नहीं, आस्था का सम्मान
हिंदू समाज में नथ, मंगलसूत्र, तुलसी माला, जनेऊ और कलावा केवल सजावट नहीं हैं ये परंपरा, संस्कार और धार्मिक पहचान के जीवंत प्रतीक हैं। इन्हें “ज्वेलरी” बताकर हटाना न केवल अज्ञानता है, बल्कि सांस्कृतिक असंवेदनशीलता का भी परिचायक है।
संवैधानिक अधिकारों की अनदेखी भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता देता है।
परीक्षा के नाम पर यदि किसी को अपने धार्मिक प्रतीक हटाने के लिए मजबूर किया जाता है, तो यह सीधे-सीधे उस अधिकार पर चोट है।
हमारी स्पष्ट चेतावनी और मांगें वर्ल्ड हिन्दू फेडरेशन, मध्य प्रदेश इस पूरे मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए मांग करता है:
समान नियम, बिना भेदभाव – सभी धार्मिक प्रतीकों पर एक समान नीति लागू की जाए।
ड्रेस कोड में स्पष्टता – NTA तुरंत अपने दिशा-निर्देशों को स्पष्ट करे और भ्रम समाप्त करे।
दोषियों पर सख्त कार्रवाई – जिन केंद्रों पर यह हुआ, वहां जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई हो। छात्राओं की गरिमा की रक्षा – भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों, इसके लिए सख्त प्रोटोकॉल बने।
अब चुप नहीं रहेगा समाज यह केवल एक परीक्षा का मुद्दा नहीं, बल्कि आस्था, सम्मान और अधिकारों की रक्षा का प्रश्न है। यदि इस पर समय रहते सुधार नहीं किया गया, तो देशभर में विरोध और जनआंदोलन होना तय है। देश की बेटियों को शिक्षा के मंदिर में अपमानित करना किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्मनाक है।
सुरक्षा के नाम पर आस्था से खिलवाड़ अब बंद होना चाहिए।
“धर्म, संस्कृति और स्वाभिमान पर चोट—अब हर हिंदू की आवाज बनेगी!”