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लेखक: विनोद सेन सिरोंज
भारत की राजनीति में अनेक नेता आए और गए, लेकिन कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जिनका मूल्यांकन केवल उनके अतीत व वर्तमान से नहीं किया जा सकता। उनका असली मूल्य समय के साथ समझ में आता है। आज भले ही कुछ लोग इसे अतिशयोक्ति समझें, कुछ इसे राजनीतिक भावनाओं का परिणाम कहें, लेकिन आने वाले समय में इतिहास इस बात का साक्षी बनेगा कि भारत की राजनीति में एक ऐसा नेता भी है जिसने कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपने विचारों और मूल्यों से समझौता नहीं किया और वह नेता हैं इस देश को आजादी दिलाने में अपना सर्वस्व निछावर करने वाले बलिदानी परिवार के यशस्वी नेता राहुल गांधी। के परिवार की बलिदानी गाथा सर्वविदित है, जिन पर देश का हर नागरिक गर्व करता है।
राहुल गांधी का व्यक्तित्व केवल एक राजनीतिक नेता का नहीं है, बल्कि वह एक ऐसे इंसान की छवि प्रस्तुत करता है जो सादगी, साहस और मर्यादा का अद्भुत संगम है। आज के समय में राजनीति अक्सर आरोप-प्रत्यारोप, कटुता और निजी हमलों से भरी दिखाई देती है, लेकिन राहुल गांधी की राजनीति में एक अलग तरह की शालीनता दिखाई देती है। उन्होंने कभी भी अपने राजनीतिक विरोधियों के परिवारों पर व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं की, कभी अमर्यादित भाषा का प्रयोग नहीं किया और हमेशा अपनी बात को संयम और तर्क के साथ रखा।
राहुल गांधी ऐसे परिवार से आते हैं जिसे भारतीय राजनीति का सबसे प्रभावशाली परिवार कहा जाता है। फिर भी उनके व्यवहार में किसी प्रकार का अहंकार नहीं दिखता। वह अक्सर साधारण लोगों के बीच बैठते हैं, उनसे संवाद करते हैं, उनकी समस्याओं को सुनते हैं। दिखावे के भाव उनमें तनिक भी नहीं है । एक राजघराने से आने के बावजूद उनका जीवन व्यवहार धरातल से जुड़ा हुआ दिखाई देता है। यही कारण है कि धीरे-धीरे लोगों के बीच उनकी छवि एक ऐसे नेता के रूप में बन रही है जो केवल सत्ता के लिए नहीं अपितु सर्व समाज के लिए राजनीति करते हैं।
राजनीतिक जीवन में राहुल गांधी को जितनी आलोचनाओं और चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, उतना शायद ही किसी नेता को करना पड़ता हो। पिछले डेढ़ दशक से लगातार उनके ऊपर तरह-तरह के आरोप– प्रत्यारोप लगाए गए, उनका मजाक उड़ाया गया, सत्ता पक्ष के विरोधियों द्वारा अपनी झूठी छवि बनाने के लिए उनके व्यक्तित्व को कमजोर दिखाने की कोशिश की गई। लेकिन इन सबके बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने संघर्ष का रास्ता चुना और लगातार जनता के बीच जाकर संवाद करने का प्रयास किया। उन्होंने जब-जब जो जो बातें कहीं वह देश के लिए सार्थक ही रही। चाहे नोटबंदी की बात हो, किसानों के हितों की बात हो या आम नागरिकों के लिए कही गई बात हो बेशक सभी बातें सत्य साबित हुई है।
यही कारण है कि आज जब “कभी हार न मानने वाला” या “संघर्ष से न डरने वाला” जैसे शब्दों की चर्चा होती है तो राहुल गांधी का नाम स्वतः सामने आता है। उनके चेहरे की मुस्कान, उनके व्यक्तित्व की सहजता और उनकी राजनीति की सादगी उन्हें बाकी नेताओं से अलग बनाती है।
प्रेम और भाईचारे के लिए निकाली गई उनकी “भारत जोड़ो यात्रा” इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। हजारों किलोमीटर की पदयात्रा करके देश के एक छोर से दूसरे छोर तक जाना केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह एक भावनात्मक संदेश था। इस यात्रा के दौरान उन्होंने देश के अलग-अलग वर्गों के लोगों से मुलाकात की — किसान, मजदूर, छात्र, महिलाएं, बुजुर्ग, छोटे व्यापारी — सभी से सीधा संवाद किया। उन्होंने लोगों के दर्द को सुना, उनकी परेशानियों को समझा और उन्हें यह विश्वास दिलाने की कोशिश की कि देश की असली ताकत उसकी एकता और भाईचारे की भावना में निहित है। इस यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने बार-बार एक ही संदेश दिया — “डरो मत।”
यह केवल दो शब्द नहीं थे, बल्कि एक विचार था। एक ऐसा विचार जो लोगों को भय और नफरत से ऊपर उठकर साहस और प्रेम की राह पर चलने की प्रेरणा देता है।
आज के दौर में जब समाज में विभाजन, नफरत और वैमनस्य की बातें अधिक सुनाई देती हैं, तब राहुल गांधी का संदेश प्रेम और भाईचारे की बात करता है। उन्होंने बार-बार कहा कि भारत की आत्मा उसकी विविधता और एकता में है। अगर समाज में डर और नफरत बढ़ेगी तो देश कमजोर होगा, लेकिन अगर प्रेम और सम्मान बढ़ेगा तो देश मजबूत बनेगा।
कई बार इतिहास ऐसे नेताओं को तुरंत पहचान नहीं पाता। लेकिन समय के साथ उनकी भूमिका और योगदान स्पष्ट होने लगता है। संभव है कि आने वाले वर्षों में राहुल गांधी के संघर्ष और उनके विचारों पर किताबें लिखी जाएं। स्कूलों और कॉलेजों में उनके जीवन और उनके राजनीतिक सफर के बारे में पढ़ाया जाए। उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में याद किया जाए जिसने बिना किसी निजी स्वार्थ के समाज में प्रेम, समानता और साहस का संदेश देने का प्रयास किया।
आदर, सम्मान और प्रतिष्ठा किसी भी व्यक्ति को केवल पद या शक्ति से नहीं मिलती। यह सब उसे अपने व्यवहार, अपने चरित्र और अपने कर्मों से कमाना पड़ता है। इतिहास में वही लोग महान कहलाते हैं जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी अपने मूल्यों को नहीं छोड़ा।
बुद्ध के वचनों में भी यही कहा गया है —
“नहि वेरेन वेरानि सम्मन्ति कुदाचनम्,
अवेरेन च सम्मन्ति — एस धम्मो सनन्तनो।”
अर्थात —
वैर से वैर कभी समाप्त नहीं होता,
वैर केवल अवैर अर्थात प्रेम और करुणा से ही समाप्त होता है।
यही सनातन सत्य है।
राहुल गांधी की राजनीति इसी विचार को सामने रखने का प्रयास करती दिखाई देती है। उनका संदेश यही है कि डर और नफरत से नहीं, बल्कि प्रेम और साहस से समाज को आगे बढ़ाया जा सकता है।
समय के साथ यह स्पष्ट होगा कि राजनीति के इस दौर में एक ऐसा नेता भी था जिसने संघर्ष से पीछे हटने की बजाय जनता के बीच जाने का रास्ता चुना। जिसने सत्ता से अधिक महत्व संवाद और संवेदनशीलता को दिया। जिसने विरोध के बावजूद अपनी मुस्कान और अपनी सादगी को बनाए रखा और शायद इसी कारण आने वाले समय में जब साहस, सादगी और निडरता की मिसालों की चर्चा होगी, तब इतिहास के पन्नों में एक नाम अवश्य दर्ज होगा, राहुल गांधी।
आदर और प्रतिष्ठा पद से नहीं, बल्कि चरित्र से मिलती है। और चरित्र की इस कसौटी पर राहुल गांधी आज एक बेमिसाल उदाहरण बनकर खड़े हैं।
राहुल गांधी सिद्धांतवादी राजनीतिक नेता हैं : कठिन समय में भी मूल्यों से समझौता नहीं।
भावनात्मक जुड़ाव: ‘जन-संवाद’ को सत्ता से ऊपर रखना है।
साहसी नेतृत्व: आलोचनाओं के बावजूद अडिग और निडर रहते हैं।
वैश्विक संदेश: नफरत के दौर में प्रेम की अनिवार्यता को समझा।
