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फ़िल्म समीक्षक : डॉ. महेन्द्र यादव
भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम इतिहास में कुछ फ़िल्में ऐसी हैं जो केवल मनोरंजन का साधन नहीं रहीं, बल्कि कला, कल्पना और संवेदना की अमर मिसाल बन गईं। सन् १९५९ में प्रदर्शित फ़िल्म नवरंग ऐसी ही एक कालजयी कृति है। महान फ़िल्मकार व्ही. शांताराम के निर्देशन में बनी यह फ़िल्म रंग, संगीत, काव्य और नृत्य का अद्भुत संगम प्रस्तुत करती है।
यह फ़िल्म एक संवेदनशील कवि की कल्पनाशील दुनिया को बड़े ही कलात्मक ढंग से प्रस्तुत करती है। यही कारण है कि दशकों बाद भी यह फ़िल्म दर्शकों और सिनेमा प्रेमियों के बीच उतनी ही लोकप्रिय और प्रासंगिक बनी हुई है।
कहानी : कल्पना और यथार्थ का संगम
फ़िल्म की कहानी एक कवि दीवाकर के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसकी भूमिका अभिनेता महीपाल ने निभाई है। दीवाकर की पत्नी जमुना (अभिनेत्री संध्या) एक सरल और व्यवहारिक स्त्री है।
कवि दीवाकर अपनी कल्पनाओं में इतना डूब जाता है कि उसे अपनी पत्नी के भीतर ही एक काल्पनिक प्रेरणा “मोहिनी” दिखाई देने लगती है। यही मोहिनी उसकी कविताओं और सृजन का स्रोत बन जाती है।
फ़िल्म में एक कलाकार के मन की संवेदनशीलता और उसकी कल्पनाशील दुनिया को बहुत ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया है। यह कहानी दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर करती है कि कलाकार की दुनिया कितनी अलग और रंगों से भरी होती है।
प्रमुख कलाकार
फ़िल्म के कलाकारों ने अपने सशक्त अभिनय से कहानी को जीवंत बना दिया है—
महीपाल — दीवाकर
संध्या — जमुना / मोहिनी
केशवराव दाते
बाबूराव पेंढारकर
आगा
संध्या का अभिनय और उनके मनमोहक नृत्य इस फ़िल्म की सबसे बड़ी विशेषता हैं।
निर्माण और तकनीकी पक्ष
इस फ़िल्म का तकनीकी पक्ष भी अत्यंत प्रभावशाली है—
निर्माता व निर्देशक : व्ही. शांताराम
संगीतकार : सी. रामचंद्र
गीतकार : भरत व्यास
छायांकन : जी. बालकृष्ण
संपादन : चिंतामणि बोरकर
व्ही. शांताराम ने रंगों, प्रकाश और नृत्य का जो अद्भुत प्रयोग किया है, वह इस फ़िल्म को दृश्यात्मक दृष्टि से भी अत्यंत समृद्ध बनाता है।
अमर संगीत और लोकप्रिय गीत
इस फ़िल्म का संगीत हिंदी सिनेमा के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। संगीतकार सी. रामचंद्र ने इस फ़िल्म में कई अविस्मरणीय धुनें दीं।
फ़िल्म के लोकप्रिय गीत हैं—
“आधा है चंद्रमा रात आधी” — गायक : महेंद्र कपूर, आशा भोंसले
“तू छुपी है कहाँ” — गायक : मन्ना डे
“अरे जा रे हट नटखट” — गायिका : आशा भोंसले
“श्यामल श्यामल बरन”
इन गीतों की काव्यात्मकता और मधुरता आज भी श्रोताओं के मन को आनंदित कर देती है।
पुरस्कार और सम्मान
फ़िल्म को उस समय तकनीकी उत्कृष्टता के लिए सम्मानित भी किया गया।
सन् १९६० में इसे फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ ध्वनि श्रेणी में सम्मान प्राप्त हुआ।
हालाँकि पुरस्कारों की संख्या सीमित रही, लेकिन समय के साथ यह फ़िल्म दर्शकों और समीक्षकों के बीच एक कल्ट क्लासिक के रूप में स्थापित हो गई।
फ़िल्म से मिलने वाली सीख
“नवरंग” हमें कई महत्वपूर्ण बातें सिखाती है—
कला और कल्पना जीवन को नए रंग देती हैं।
कलाकार का मन अत्यंत संवेदनशील और कल्पनाशील होता है।
प्रेरणा अक्सर हमारे अपने जीवन और संबंधों से ही जन्म लेती है।
यह फ़िल्म हमें यह भी सिखाती है कि जब कल्पना और वास्तविकता का संगम होता है, तभी सच्ची कला जन्म लेती है।
यह फ़िल्म क्यों देखनी चाहिए
यदि आप हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दौर को समझना चाहते हैं, तो “नवरंग” अवश्य देखनी चाहिए।
इस फ़िल्म को देखने के प्रमुख कारण हैं—
अद्भुत नृत्य और रंग संयोजन
मधुर और अमर संगीत
एक संवेदनशील कवि की मनोभूमि का सुंदर चित्रण
और महान फ़िल्मकार व्ही. शांताराम की अद्वितीय सिनेमाई दृष्टि।
कहाँ देख सकते हैं
आज के समय में यह कालजयी फ़िल्म यूट्यूब पर उपलब्ध है। इसके अलावा समय-समय पर कुछ डिजिटल मंचों पर भी क्लासिक फ़िल्मों के संग्रह में इसे देखा जा सकता है।
अंतिम शब्द
“नवरंग” वास्तव में रंग, कविता और संगीत से सजी एक अद्भुत सिनेमाई रचना है। जब पर्दे पर संध्या का मनमोहक नृत्य और सी. रामचंद्र का मधुर संगीत गूँजता है, तो लगता है जैसे सिनेमा स्वयं कविता बन गया हो।
यदि आपने अभी तक यह फ़िल्म नहीं देखी है, तो समझ लीजिए कि आपने भारतीय सिनेमा की एक अनमोल धरोहर को देखने का अवसर अभी तक नहीं लिया।
एक शाम निकालिए, “नवरंग” देखिए — और यक़ीन मानिए, यह फ़िल्म आपके मन में रंग, संगीत और कल्पना की ऐसी छाप छोड़ जाएगी कि आप इसे केवल देखेंगे ही नहीं, बल्कि लंबे समय तक महसूस भी करेंगे।
