Aaj ka Panchang 08 August 2026: आज सर्वार्थ सिद्धि योग में रखा जाएगा रोहिणी व्रत, नोट करें राहुकाल का समय, यहां पढ़ें पूरा पंचांग
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मनोज कुमार अग्रवाल
समूचे देश समेत विशेषकर उत्तर भारत में मनाया जाने वाला होली पर्व आस्था विश्वास ऋतु परिवर्तन और सामाजिक एकता का लोकपर्व है। होली के दिन समूचा समाज सवर्ण असवर्ण गरीब अमीर सबल निर्बल राजा प्रजा ऊंच नीच के दायरे से बाहर आकर एक दूसरे को रंग गुलाल लगा कर सामाजिक समरसता व सौहार्द का सूत्रपात करता है। यह लोकपर्व इतना सजीव व सामाजिक वैज्ञानिक आधार से जुड़ा है कि इस की प्रासंगिकता कभी खत्म नहीं हो सकती है। इस लोकपर्व के संबंध में प्रह्लाद और होलिका की कथा सबसे ज्यादा प्रचलित है। पुराने समय में हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रहलाद विष्णु जी का परम भक्त था। ये बात हिरण्यकश्यप को पसंद नहीं थी। इस वजह से वह प्रह्लाद को मारना चाहता था। असुर राज हिरण्यकश्यप ने बहुत कोशिश की, लेकिन प्रहलाद को मार नहीं सका। तब असुरराज की बहन होलिका प्रहलाद को लेकर आग में बैठ गई। होलिका को आग में न जलना का वरदान मिला हुआ था, लेकिन भगवान विष्णु जी की कृपा से होलिका जल गई और प्रह्लाद बच गया। तभी से प्रह्लाद की जीत के रूप में होली दहन का पर्व मनाया जाता है।
गाली देने की रीति
होली के गीतों में वैसे भी गालियां पिरोई होती हैं। शब्दों का प्रयोग कुछ इस प्रकार किया गया होता है कि लोग उसे सुन कर मस्ती करते हैं और उन्हें भीतर तक गुदगुदी होती है। वाराणसी, मिथिलांचल, कुमाऊं, राजस्थान, हरियाणा में होली पर गाली की अनोखी परंररा है। होली एक ऐसा त्योहार है, जो रंगों की मस्ती के साथ-साथ गालियों और गुदगुदाते गीतों के लिए भी खूब जाना जाता है। इसीलिए इस त्योहार को सबसे अनूठा कहते हैं। साल भर लोगों को इसका इंतजार रहता है। लोग गालियों और गीतों के जरिए अपनी भड़ास निकालते हैं। जैसा प्रदेश, वैसे गीत और वैसी ही वहां की गालियां। बहुरंगी होली की ये छटा दुनिया भर में निराली है। काशी की परंपराएं इसलिए अनूठी हैं क्योंकि यहां होली पर गालियों का भी अपना एक अलग संस्कार देखने को मिलता है। दूसरे शहरों में गाली देने पर मार हो जाए, लेकिन यहां होली पर गालियां मनभावन लगती हैं।
लट्ठमार होली
श्रीकृष्ण की जन्मभूमि मथुरा से करीब 50 किमी दूर बरसाना की होली बहुत खास होती है। बरसाना में कई दिनों तक लट्ठमार होली खेली जाती है। फाल्गुन पूर्णिमा से पहले ही लोग यहां होली खेलना शुरू कर देते हैं। पास के नंदगांव के पुरुष बरसाना आते हैं और बरसाना के पुरुष नंदगांव जाते हैं। इन गांवों की महिलाएं पुरुषों को लट्ठ मारती हैं और पुरुष ढाल से बचने की कोशिश करते हैं। ये होली देखने देश-विदेश से लाखों लोग यहां आते हैं।
फूलों की होली
मान्यता है कि मथुरा-वृंदावन में श्रीकृष्ण ने राधा और गोपियों के साथ होली खेली थी। इसी वजह से इन जगहों पर होली की अच्छी खासी धूम होती है। मथुरा-वृंदावन में श्रीकृष्ण के भक्त बड़ी संख्या में होली खेलने पहुंचते हैं। यहां के मंदिरों में फूलों से होली खेली जाती है।बांके बिहारी मंदिर में फूलों की होली अवर्णनीय है।
मसाने की होली
वाराणसी(काशी) के मणिकर्णिका घाट पर खेली जाने वाली होली विश्व प्रसिद्ध है। यहां शमशान की राख से होली खेली जाती है। मान्यता है कि शिव जी ने यहां अपने गणों के साथ चिता की राख से होली खेली थी। इसी मान्यता की वजह से आज भी शिव भक्त यहां मसाने की होली खेलते है। देश दुनिया में यह एकमात्र ऐसी होली है जिसमें चिता भस्म को रंग गुलाल की तरह इस्तेमाल करते हुए होली खेलते हैं।
फालैन गांव की होली
एक ऐसी भी होली है जहां जलती होली की लपटों के बीच पंडा नंगे पांव निकल जाता है लेकिन खरोंच तक नहीं आती है। मथुरा से करीब 50 किमी दूर एक गांव है फालैन। इसे प्रहलाद का गांव भी कहते हैं। फालैन गांव की होली की खास बात ये है कि यहां जलती हुई होली के बीच में से एक पंडा चलकर गुजरता है। होली ऊंची-ऊंची लपटों से निकलने के बाद भी पंडे का बाल तक नहीं जलता है। ये चमत्कार देखने के लिए देश-दुनिया से काफी लोग यहां पहुंचते हैं।
कर्नाटक की होली
कर्नाटक के हम्पी की होली भी दुनियाभर में फेमस है। ये जगह यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज में शामिल है। इस जगह का संबंध त्रेतायुग की वानर सेना से है। मान्यता है कि सुग्रीव अपनी वानर सेना के साथ इसी क्षेत्र में रहते थे। यहां होली पर बड़ा आयोजन होता है। हजारों लोग यहां होली खेलने आते हैं।
राजस्थान की होली
उदयपुर और पुष्कर में आज भी शाही तौर तरीकों से होली खेली जाती है। इस मौके पर राजपुताना आन बान शान देखने को मिलती है।
कई दूसरे एशियाई देशों में भी होली के प्रतिरूप रंगों का पर्व मनाया जाता है लेकिन भारतीय होली यकीनन आज भी अनूठी मस्ती से भरी है। यह समाज को एक सूत्र में पिरो कर उमंग व उत्साह का संचार करती है।
