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राकेश ओमप्रकाश मेहरा के निर्देशन में बनी रंग दे बसंती भारतीय सिनेमा की सबसे असरदार फिल्मों में गिनी जाती है। इस फिल्म ने न सिर्फ फिल्ममेकिंग की सोच बदली, बल्कि समाज से जुड़े मुद्दों को बेबाक तरीके से सामने रखने की हिम्मत भी दिखाई। 26 जनवरी को रिलीज़ हुई यह फिल्म इस रिपब्लिक डे पर अपने थिएटर रिलीज़ के 20 साल पूरे करने जा रही है। आमिर खान, शरमन जोशी, सिद्धार्थ समेत कई कलाकारों की दमदार मौजूदगी वाली रंग दे बसंती एक ऐसा सिनेमा बन गई, जिसने पूरे देश में चर्चा छेड़ दी और अपनी मजबूत कहानी व निडर आवाज़ से दर्शकों के दिलों में गहरी जगह बना ली।
फिल्म के 20 साल पूरे होने से पहले, निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने इसकी आज भी कायम सोच और दुनिया भर में इसकी अहमियत पर बात की। उन्होंने कहा कि रंग दे बसंती सिर्फ एक फिल्म नहीं रही, बल्कि एक आंदोलन बन गई है, जो अब इसके मेकर्स की नहीं बल्कि लोगों की अपनी कहानी बन चुकी है।
फिल्म की 20 साल बाद भी अहमियत पर बात करते हुए राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने कहा कि “रंग दे बसंती को रिलीज़ हुए 20 साल हो गए हैं। फिल्म 26 जनवरी 2006 को आई थी, लेकिन मेरे लिए ये आज 20 साल और जवान हो गई है। इसका मैसेज, म्यूज़िक और सोशल असर आज भी उतना ही मजबूत है जितना तब था। ये सिर्फ भारत या सबकॉन्टिनेंट तक सीमित नहीं रही, बल्कि वेस्टर्न देशों, जापान, फार ईस्ट एशिया, कोरिया और खास तौर पर अमेरिका में भी इसे खूब सराहा गया है।”
उन्होंने आगे रंग दे बसंती की खास उपलब्धियों और लोगों से उसके जुड़ाव पर बात करते हुए कहा, “रंग दे बसंती ने जो हासिल किया, वो बहुत खास है। ये इकलौती फिल्म है जिसे बाफ्टा नॉमिनेशन मिला। ये ऑस्कर के लिए भारत की ऑफिशियल एंट्री भी थी और हमें इसके लिए चार नेशनल अवॉर्ड, यानी प्रेसिडेंट्स मेडल भी मिले। ये सब हमारे लिए बहुत सम्मान की बात है। लेकिन आज मैं महसूस करता हूं कि रंग दे बसंती अब सिर्फ मेरी फिल्म नहीं रही। ये अब लोगों की फिल्म बन चुकी है।”
राकेश ओमप्रकाश मेहरा के निर्देशन में बनी रंग दे बसंती में आमिर खान, सिद्धार्थ, सोहा अली खान, शरमन जोशी, कुणाल कपूर और अतुल कुलकर्णी अहम किरदारों में नजर आए। कहानी कुछ बेफिक्र युवाओं की है, जिनकी जिंदगी तब बदल जाती है जब वे आज़ादी के सेनानियों पर एक डॉक्यूमेंट्री बनाते हैं। उन क्रांतिकारियों की भूमिका निभाते-निभाते वे भ्रष्टाचार और नाइंसाफी की सच्चाई से रूबरू होते हैं और फिर उसके खिलाफ आवाज़ उठाने का फैसला करते हैं, जो उनकी ज़िंदगी की दिशा ही बदल देता है।
