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1 अगस्त से 7 अगस्त विश्व स्तनपान सप्ताह विशेष :-
“मां का स्तनपान-शिशु के लिए है अमृत समान।”
हमारे देश में बच्चों को लंबे समय तक स्तनपान कराने की परंपरा रही है। गांव-देहातों में तो आज भी माताएं बच्चे को 12 माह से 18 माह तक दूध पिलाती है। एक शोध अध्ययन के अनुसार शिशु को बचपन में सही स्तनपान करवाने से वे शिशु स्कूल पढ़ाई में बेहतर प्रदर्शन करते हैं। गणित जैसे विषयों में उच्चतम अंक हासिल करने के साथ ही उनका बुद्धि का स्तर भी तेजी से बढ़ता है। जिन बच्चों को लंबी अवधि तक स्तनपान कराया गया उनका प्रदर्शन उतना ही अच्छा रहा है।
हर वर्ष 1 अगस्त से 7 अगस्त तक विश्व स्तनपान सप्ताह मनाया जाता है जो कि इस वर्ष भी मनाया जा रहा है। भारत जैसे विकासशील देशों में स्तनपान का महत्व और अधिक है। केरल राज्य में शिशु मृत्यु दर सबसे कम है एवं केरल के आंकड़े किसी भी विकसित राष्ट्र के बराबर है। वहां 99% बच्चों को पहले 4 महीनों में केवल मां का दूध पिलाया जाता है, इन चार माह में बच्चों को शहद, चाय, पानी, जन्म घुट्टी, या ऊपर का दूध कुछ भी नहीं दिया जाता है। यह सब संभव हुआ है, वहां की माताओं के साक्षर होने के कारण। कुछ डॉक्टर का कहना है कि बच्चों को जन्म घुट्टी ,चाय अन्य पदार्थ नहीं देना चाहिए, जिससे बच्चा बार-बार बीमार होगा और कुपोषण का शिकार हो सकता है।
परिस्थितियां कैसी भी रही हो, मां हमेशा अपने बच्चों की रक्षा करती है। कोरोनाकाल में भी यह बात साबित हुई थी, इस कोरोनाकाल में भी मां का दूध बच्चों के लिए रक्षा कवच बना हुआ था। मां भले ही कोरोनाग्रस्त रही हो लेकिन स्तनपान करवाने से बच्चों को कोरोना का संक्रमण नहीं हुआ।
स्तनपान को बढ़ावा देने व दुनिया भर में बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार के लिए स्तनपान कराने की जागरूकता की साप्ताहिक शुरुआत अगस्त 1990 में हुई थी एवं इसी वर्ष विश्व स्तनपान सप्ताह घोषित किया गया। इसका उद्देश्य स्तनपान को बढ़ावा देना और बच्चों को सही पोषण और बेहतर स्वास्थ्य दिलाना है। विकासशील देशों में यदि स्तनपान को पूरी तरह अपनाया जाए तो प्रतिवर्ष 60 लाख बच्चों को बचाया जा सकता है। इसके साथ ही स्तनपान कराने से स्तन कैंसर के कारण हर साल मरने वाली 20हजार माताओ की जान बचाई जा सकती है।
WHO के अनुसार बच्चे के जन्म के 1 घंटे से लेकर 6 महीने का होने तक स्तनपान कराने की सलाह दी जाती है। एक अध्ययन के अनुसार दुनिया भर में 10 में से 3 माताऐं बच्चे के जन्म के बाद उसकी सही देखभाल नहीं करती है। ये बच्चे बोतल से दूध पीने के कारण डायरिया और निमोनिया जैसी बीमारियों का शिकार होकर मौत का मुंह देखते हैं। अकेले भारत में 13 लाख बच्चे माँ का दूध नहीं मिलने और सिर्फ बोतल का दूध पीने की वजह से प्रतिवर्ष मर जाते हैं। डिब्बा बंद दूध पिलाने के कारण देश में लोगों को प्रतिवर्ष 7हजार131 करोड़ रुपए खर्च करना पड़ रहे है।
दिल्ली के प्रमुख शिशु रोग विशेषज्ञ प्रोफेसर एस. भंबल ने कहा की मां का दूध एक प्राकृतिक संसाधन है, लेकिन कतिपय माताओ की भ्रांतियां और व्यस्तताओं के साथ ही दूध बनाने वाली कंपनियों के दुष्प्रचार की वजह से इसका उपयोग नहीं हो पा रहा है। डॉक्टर भंबल ने कहा कि व्यापारिक प्रवृत्ति और अज्ञानता डॉक्टरो पर भी हावी है, जिसकी वजह से भी नवजात शिशुओं के पालकों को मिल्क पाउडर के उपयोग की सलाह देते हैं। इस तरह रबड़ के निप्पल तथा बोतल से दिए जाने वाला दूध नन्हे शिशुओं में रोगों के संक्रमण का जरिया बनता है। उन्होंने बताया कि जो मां जितना अधिक अपना स्वयं का दूध बच्चे को पिलाएगी, उतना ही अधिक दूध उसके शरीर में निर्मित होगा। डॉक्टर भंबल के अनुसार रात्रि में शिशुओं को भरपूर मात्रा में दूध पिलाया जाना चाहिए।
हम सभी जानते हैं कि नवजात शिशु के लिए मां का दूध बहुत ही जरूरी होता है, लेकिन कई बार विपरीत परिस्थितियों के कारण शिशु को मां का दूध नहीं मिल पाता है। शिशु की सेहत का ख्याल रखते हुए कई संस्थाओं ने इस समस्या का समाधान भी किया है। इसी संदर्भ में विश्व का पहला ह्यूमन मिल्क बैंक ऑस्ट्रिया के विएना शहर में स्थापित किया गया है। वही भारत में यह श्रेय मुंबई महानगर को मिला है। इसके अतिरिक्त नई दिल्ली में अमारा मिल्क बैंक एवं वात्सल्य मातृकोष तथा पुणे में यशोदा मिल्क बैंक जैसे कई दुग्ध कोष भारत के विभिन्न शहरों में संचालित किए जा रहे हैं।
ब्राजील में ब्रेस्ट मिल्क बैंक्स की बहुतायत पूरी दुनिया के समक्ष एक उत्तम उदाहरण प्रस्तुत करती है। यदि इस ब्रेस्ट मिल्क बैंक प्रथा को अपना लिया जाए तो निश्चित तौर पर नवजात शिशुओ की मृत्यु दर में कमी देखी जा सकेगी, इसके लिए जागरूकता अत्यंत आवश्यक है। वर्तमान चिकित्सा विज्ञान भी मां के दूध की उपयोगिता का समर्थन करता है। मां का दूध सदैव ताजा व हर तरह से जीवाणुओं से रहित होता है। निश्चित ही मां का दूध बच्चे का केवल संपूर्ण पोषण ही नही बल्कि माँ का अपने बच्चे के प्रति अगाध प्रेम, संबल और अटूट संबंध का वाहक भी है। मां का दूध बच्चों के लिए गुणकारी है, यह संपूर्ण आहार माना गया है, इससे बच्चों को रोगों से लड़ने की क्षमता पैदा होती है।
डा. बी , आर,नलवाया
पूर्व प्रभारी प्राचार्य ,प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ़ एक्सीलेंस
मंदसौर
