बोल नहीं सकती तो क्या हुआ, लिखकर भी रख सकती हैं अपना पक्ष; छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी
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इन्दौर: (*प्रोफेसर सतीश चोपड़ा*) नाकोड़ा पार्श्वनाथ श्वे. जैन मंदिर गुमाश्तानगर में परम पूज्य दमिता श्रीजी और मुक्ति प्रिया श्रीजी की निश्रा सात दिवसीय उत्तराध्ययन महोत्सव प्रारम्भ हुआ।मुक्तिप्रिया श्रीजी ने बताया की भगवान महावीर की अनुभूति ,अभिव्यक्ति,ऐश्वर्य (सौन्दर्य)वैभव (सुवास ),प्रीति और भक्ति सहित ज्ञान, दर्शन, चारित्र तीनों का सुन्दर संगम इस आगम में है ।आगम का अर्थ आपने बताया की- आ=अरिहंतो की वाणी, ग = गणधर द्वारा गूँथी हुई, म = मुनियो द्वारा श्रवण कराई गयी। जिस प्रकार हिन्दुओं में गीता का, मुस्लिम धर्म में कुरान का, ईसाई धर्म में बाइबिल का महत्व है वही महत्व जैन धर्म में जिन आगमो का है।साध्वी शिवम् प्रिया श्रीजी ने सात दिवसीय उत्तराध्ययन महोत्सव का प्रारम्भ करते हुये आज सात अध्यायों का वाचन किया जिनका सार इस प्रकार है :-(१)*विनय श्रुत* अध्याय के बारे में बताते हुए कहा कि दो प्रकार के शिष्य होते हैं जिसमें जो गुरु की आज्ञा का पालन करता है गुरु के मनोभावों को समझता है वह विनीत ( विनयवान) शिष्य कहलाता है, इसके विपरीत आचरण करने वाला शिष्य अविनीत कहलाता है। विनय शिष्य पूरे जगत में पूजनीय होता है।(२)*परिषह* के बारे में बताते हुए आपने कहा कि साधुओं को 22 प्रकार के परिषह (कष्ट) सहने पड़ते हैं। परिषह और उपसर्ग को समझाते हुए बताया कि शारीरिक, मानसिक कष्ट शरीर या मन के कारण होते हैं वह परिषह और जो दूसरो के द्वारा दिये जाते हैं वह उपसर्ग हैं भगवान महावीर ने परिषह और उपसर्ग समता भाव से सहते हुए सिद्ध शिला तक पहुँचे, इसीलिये वे पूजनीय हैं और उनकी वाणी का श्रवण करने यहा आये हैं।(३)*चतुरंगीय* पर बोलते हुए आपने बताया की चार चीजें दुर्लभ है- मनुष्य जीवन, श्रवण, श्रद्धा और चारित्र जिस प्रकार रेगिस्तान में जल का मिलना दुर्लभ है, नारकी के जीव को प्रभु की प्रतिमा के दर्शन मिलना मुश्किल है उसी प्रकार ये चार चीजे मिलना भी दुर्लभ हैं, इसलिये इनका प्रयोग अच्छे कामो मे करना चाहिये।(४)*असंस्कृत* पर बोलते हुए आपने कहा कि जूता टूट जाए तो मोची, सोने की चैन टूट जाए तो सुनार, कपड़ा फट जाये तो दर्जी, हड्डी टूट जाये तो डाक्टर सही कर देगा किन्तु टूटा हुआ जीवन कोई सुधारने वाला नहीं है, इसलिए एक समय का भी प्रमाद मत करो, प्रमादी, हिंसक, और असंयमी मनुष्यों को किसी की शरण मिलने वाली नहीं है।(५)*अकाम-मरणीय* पर चर्चा करते हुये आपने कहा कि दो प्रकार की मृत्यु होती है अकाम मरण और सकाम मरण, साधु हो या गृहस्थ हो हिंसा आदि से निवृत होते हैं वे संयम और तप का अभ्यास कर देव लोक में जाते हैं। (६)*क्षुल्लक निर्ग्रन्थीय* का वाचन करते हुये बताया की दुखो का प्रमुख कारण हमारी अज्ञानता है, ज्ञान और अंधकार के अन्तर पर इस अध्याय में प्रकाश डाला गया है।(७)*उरभ्रीय* का सार बताते हुये आपने कहा कि पांचो इन्द्रिया पावरफुल हैं उनको नियंत्रण में रखने का प्रयास करना चाहिये, जिह्वा रूपी इन्द्रिय के बारे मे बताते हुये कहा कि यह अच्छा बोलती है और बुरा भी, हम सही उपयोग करे इसे नियंत्रित करे तो यह हमारे शरीर के लिये व संबन्धो के लिये अच्छा होगा। अन्त में आपने आज के विषय *’जिन आगम शरणं’* के अनुसार हमे हमारा जीवन आगमो को समर्पित करते हुए उसकी वाणी को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करे। आज के दिन का यही सार है।
