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Spread the love पटना/दरभंगा। आश्विन शुक्ल दशमी अर्थात्...
पटना/दरभंगा। आश्विन शुक्ल दशमी अर्थात् विजयादशमी एवं दुर्गा-विसर्जन की तिथि को लेकर इस वर्ष उत्पन्न चर्चा में मूल प्रश्न केवल तारीख का नहीं, बल्कि सूर्योदय के समय विद्यमान तिथि, कर्मकाल तथा धर्मशास्त्रीय तिथि-निर्णय का है। उपलब्ध पंचांग-गणना के अनुसार 20 अक्टूबर 2026 को सूर्योदय के समय नवमी विद्यमान रहेगी और नवमी प्रातः 9:46 बजे तक रहेगी। इसके बाद दशमी का प्रवेश होगा। वहीं 21 अक्टूबर को सूर्योदय के समय दशमी विद्यमान रहेगी और वह प्रातः 11:02 बजे तक रहेगी।ऐसी स्थिति में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से विचारणीय है कि विजयादशमी तथा दुर्गा-विसर्जन जैसे प्रातःकालीन देवकर्म के लिए 20 अक्टूबर की नवमी-विद्ध दशमी को ग्रहण किया जाए अथवा 21 अक्टूबर की सूर्योदयव्यापिनी दशमी को। इस प्रश्न पर धर्मशास्त्रीय परंपरा, पंचांग-गणना और कर्मकाल—तीनों का समन्वित विचार अपेक्षित है।धर्मशास्त्रीय परंपरा में तिथि का निर्णय केवल कैलेंडर की तारीख देखकर नहीं किया जाता। कर्म का स्वरूप, कर्मकाल, सूर्योदय, तिथि की व्याप्ति तथा संबंधित शास्त्रीय विधान—इन सभी को साथ रखकर निर्णय किया जाता है। इसी दृष्टि से विभिन्न विद्वानों से प्राप्त मत इस विषय को समझने में उपयोगी हैं।डॉ. राज नाथ झा : देवकर्म में पूर्वाह्न और सूर्योदयव्यापिनी दशमी का विशेष महत्वडॉ. राज नाथ झा, वरिष्ठ धर्मशास्त्री एवं निदेशक, ज्योतिर्वेद विज्ञान संस्थान, ने इस विषय पर विस्तार से विचार रखते हुए कहा कि विजयादशमी एवं दुर्गा-विसर्जन जैसे देवकर्म के निर्णय में पूर्वाह्न तथा सूर्योदय के समय विद्यमान तिथि को विशेष महत्व दिया जाना चाहिए। श्रुति का सिद्धान्त है—“पूर्वाह्णो वै देवानाम्”, अर्थात् पूर्वाह्न देवताओं के कर्म का काल है। जब किसी प्रसंग में श्रुति और स्मृति के विधान में विरोध दिखाई दे, तो शास्त्रीय परंपरा में श्रुति को अधिक बलवान माना जाता है।उन्होंने दुर्गा-पूजन एवं विसर्जन के संदर्भ में विष्णुधर्मोत्तर का यह प्रमाण प्रस्तुत किया—“प्रातरावाहयेद् देवीं प्रातरेव प्रवेशयेत्।ततः प्रातश्च सम्पूज्य प्रातरेव विसर्जयेत्॥”अर्थात् देवी का आवाहन, प्रवेश, पूजन और विसर्जन प्रातःकाल में करने का विधान बताया गया है। इसलिए विसर्जन के लिए प्रातःकाल में कौन-सी तिथि विद्यमान है, यह निर्णय का महत्वपूर्ण आधार बन जाता है।डॉ. राज नाथ झा ने नन्दिकेश्वर के प्रमाण को भी रेखांकित किया—“भगवत्याः प्रवेशादि विसर्गान्ताश्च याः क्रियाः।रवेरुदयगामिन्यां ताः सर्वाः कारयेद्बुधः॥”अर्थात् भगवती के प्रवेश से लेकर विसर्जन तक की क्रियाएँ उस तिथि में करने का विधान बताया गया है जो सूर्योदय के समय विद्यमान हो। इस दृष्टि से यदि 20 अक्टूबर के सूर्योदय पर नवमी विद्यमान है और दशमी 9:46 बजे के बाद आती है, तो 20 अक्टूबर की प्रातःकालीन दशमी-विसर्जन की स्थिति पर शास्त्रीय विचार अपेक्षित होगा। इसके विपरीत 21 अक्टूबर को सूर्योदय के समय दशमी विद्यमान है और वह 11:02 बजे तक रहती है, अतः प्रातःकालीन दशमी-कर्म के लिए पर्याप्त समय उपलब्ध दिखाई देता है।उन्होंने हेमाद्रि के प्रमाण की ओर भी ध्यान आकृष्ट किया—“घटिकातो यदा न्यूना दशमी स्यात्परेऽहनि।पूर्वेद्युस्तु तदा देवीं पूजयित्वा विसर्जयेत्॥”इसमें अगले दिन की दशमी की अल्पावधि की स्थिति में पूर्वदिन देवी-पूजन एवं विसर्जन की विशेष व्यवस्था का संकेत मिलता है। उनके मत में जब अगले दिन दशमी पर्याप्त काल तक विद्यमान हो, तब इस विशेष व्यवस्था को लागू करने से पहले उसके औचित्य पर विचार किया जाना चाहिए।हेमाद्रि में ही—“श्रवणर्क्षसमोपेता भास्करोदयगामिनी।तत्राल्पाचीं विधायैव प्रणिपत्य विसर्जयेत्॥”जैसे प्रमाणों के माध्यम से सूर्योदयगामिनी तिथि के महत्व की ओर संकेत मिलता है।डॉ. राज नाथ झा के मतानुसार 20 अक्टूबर की प्रातः नवमी और 21 अक्टूबर की प्रातः दशमी—दोनों स्थितियों को एक समान मानकर निर्णय करना उचित नहीं होगा। उपलब्ध तिथि-गणना और प्रस्तुत धर्मशास्त्रीय प्रमाणों को देखते हुए 21 अक्टूबर की सूर्योदयव्यापिनी दशमी में प्रातःकालीन विजयादशमी एवं दुर्गा-विसर्जन का पक्ष अधिक विचारणीय प्रतीत होता है।डॉ. वरुण कुमार झा : पंचांग केवल तारीखों की सूची नहीं, कर्मकाल का गणित भी हैडॉ. वरुण कुमार झा, सहायक प्राचार्य एवं गणितकर्ता-सहसम्पादक, विश्वविद्यालय पंचांग, कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय, ने कहा कि तिथि-निर्णय इस बात पर निर्भर करता है कि जिस कर्म के लिए निर्णय किया जा रहा है, उस कर्म के समय कौन-सी तिथि विद्यमान है।उनके अनुसार यदि 20 अक्टूबर को सूर्योदय के समय नवमी है और दशमी बाद में आती है, जबकि 21 अक्टूबर के सूर्योदय पर दशमी विद्यमान है, तो दोनों स्थितियों को समान रूप से नहीं देखा जा सकता। पंचांग केवल तारीखों की सूची नहीं है; सूर्योदय, तिथि की अवधि, तिथि का आरंभ और अंत, कर्मकाल तथा शास्त्रीय नियम—इन सभी का समन्वय आवश्यक है।उन्होंने कहा कि समाज के लिए केवल यह जानना पर्याप्त नहीं है कि विजयादशमी किस तारीख को है; यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि उसके पीछे गणितीय आधार और लागू कर्मकाल क्या है। यदि 21 अक्टूबर के सूर्योदय पर दशमी विद्यमान है, तो 21 अक्टूबर की प्रातः दशमी-विसर्जन को शास्त्रीय प्रमाणों के साथ गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।डॉ. विश्वनाथ झा : सूर्योदय में दशमी की उपस्थिति निर्णय का प्रमुख आधारडॉ. विश्वनाथ झा, वरिष्ठ धर्मशास्त्री, ने नारद के प्रमाण को आधार बनाते हुए कहा कि आश्विन शुक्ल दशमी के संदर्भ में सूर्योदय के समय तिथि की उपस्थिति को विशेष महत्व प्राप्त है। नारद का वचन है—“सूर्योदये यदा राजन् दृश्यते दशमी तिथिः।आश्विने मासि शुक्ले तु विजयां तां विदुर्बुधाः॥”अर्थात् आश्विन शुक्ल पक्ष में सूर्योदय के समय दशमी दिखाई दे तो विद्वान उसे विजयादशमी के रूप में जानते हैं। इस दृष्टि से 21 अक्टूबर को सूर्योदयव्यापिनी दशमी का होना एक महत्वपूर्ण आधार के रूप में सामने आता है।डॉ. देव कृष्ण झा : तिथि को प्रधानता, नक्षत्र उसका आश्रितडॉ. देव कृष्ण झा, मीमांसा के विद्वान, ने तिथि के प्रधानत्व की ओर संकेत करते हुए विद्यापति-परंपरा में उद्धृत वचन प्रस्तुत किया—“तिथिः शरीरं देवस्य तिथौ नक्षत्रमाश्रितम्।तस्मात्तिथिं प्रशंसन्ति नक्षत्रं न तिथिं विना॥”उनके अनुसार देवकर्म के निर्णय में तिथि को मूल आधार मानना चाहिए। नक्षत्र सहित अन्य गणनाएँ अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हैं, लेकिन तिथि की वास्तविक स्थिति की उपेक्षा करके निर्णय करना उचित नहीं होगा।डॉ. राम कुमार झा : तिथि ही प्रमाण और साधनडॉ. राम कुमार झा, सहायक प्राध्यापक ज्योतिष, श्री जगदम्बा संस्कृत महाविद्यालय, बाथो, दरभंगा, ने लल्लस्मृति के वचन को आधार बनाया—“तिथिः शरीरं तिथिरेव कारणम्।तिथिः प्रमाणं तिथिरेव साधनम्॥”उनके अनुसार तिथि केवल पंचांग की गणितीय सूचना नहीं, बल्कि धार्मिक कर्म के निर्णय की आधारभूत इकाई है। इसलिए विजयादशमी जैसे विशिष्ट कर्म में तिथि की वास्तविक स्थिति को सामने रखकर ही निर्णय किया जाना चाहिए। 21 अक्टूबर के सूर्योदय पर दशमी की उपस्थिति इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है।डॉ. राकेश कुमार झा : पर्याप्त दशमी होने पर पूर्वदिन की नवमी-विद्ध स्थिति पर पुनर्विचार आवश्यकडॉ. राकेश कुमार झा, गणितकर्ता एवं सम्पादक, ने हेमाद्रि के विधान की ओर संकेत करते हुए कहा कि अगले दिन दशमी की स्थिति को उसकी वास्तविक अवधि के आधार पर देखा जाना चाहिए। यदि अगले दिन दशमी अत्यल्प समय के लिए हो, तभी पूर्वदिन की विशेष व्यवस्था का प्रश्न सामने आता है। वर्तमान गणना में 21 अक्टूबर को सूर्योदय से 11:02 बजे तक दशमी का पर्याप्त काल उपलब्ध है।इसलिए 20 अक्टूबर के सूर्योदय पर नवमी रहने की स्थिति में केवल बाद में प्रारंभ होने वाली दशमी के आधार पर उसी दिन के प्रातःकालीन विजयादशमी-विसर्जन को प्राथमिकता देने से पहले उपलब्ध शास्त्रीय विकल्पों पर विचार किया जाना आवश्यक है।ज्योतिषाचार्य डॉ. शुभम सावर्ण : नवमी के काल में दशमी का ग्रहण उचित नहींज्योतिषाचार्य डॉ. शुभम सावर्ण, गोगरी, खगड़िया, ने योगिनीतंत्र के प्रमाण को सामने रखते हुए कहा—“ऋक्षाभावे तिथिर्ग्राह्या रवेरुदयगामिनी।नवमी बलिदाने तु दशमीं तत्र वर्जयेत्॥”उनके अनुसार जहां नक्षत्र की अपेक्षा तिथि का ग्रहण किया जाना हो, वहां सूर्योदयगामिनी तिथि को महत्व दिया जाता है। साथ ही नवमी के कर्मकाल में दशमी को ग्रहण न करने की व्यवस्था का भी संकेत मिलता है। इसलिए 20 अक्टूबर के सूर्योदय पर नवमी की उपस्थिति और 21 अक्टूबर के सूर्योदय पर दशमी की उपस्थिति को निर्णय में गंभीरता से लिया जाना चाहिए।20 और 21 अक्टूबर की गणना से स्पष्ट होती है स्थितितिथि| सूर्योदय के समय तिथि| तिथि की स्थिति| प्रमुख कर्म20 अक्टूबर 2026| नवमी| नवमी प्रातः 9:46 बजे तक| नवमी-संबंधी पूजन एवं हवन21 अक्टूबर 2026| दशमी| दशमी प्रातः 11:02 बजे तक| विजयादशमी एवं दुर्गा-विसर्जनइस गणना का महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि 21 अक्टूबर की दशमी केवल सूर्योदय-स्पर्श मात्र नहीं है, बल्कि सूर्योदय के बाद भी पर्याप्त पूर्वाह्नकाल तक विद्यमान है। इसलिए तिथि-निर्णय में इस तथ्य को भी ध्यान में रखना अपेक्षित है।1998 का पंचांगीय संदर्भइस प्रकार की तिथि-स्थिति को लेकर पूर्ववर्ती पंचांग-परंपरा में 1998 (संवत् 2055) का उदाहरण भी चर्चा में आता है, जब अगले दिन दशमी के पूर्वाह्न तक रहने की स्थिति में विजयादशमी के निर्णय को उसी आधार पर देखा गया था। इससे यह संकेत मिलता है कि पंचांग-निर्णय में केवल पहले दिन दशमी के स्पर्श को देखकर निर्णय करना आवश्यक नहीं, बल्कि कर्मकाल में तिथि की वास्तविक व्याप्ति का परीक्षण भी किया जाता है।निष्कर्ष : शास्त्रीय प्रमाण, गणित और कर्मकाल—तीनों का समन्वित विचारविजयादशमी का प्रश्न केवल यह तय करने का प्रश्न नहीं है कि पंचांग में 20 लिखा है या 21। वास्तविक प्रश्न यह है कि विजयादशमी और दुर्गा-विसर्जन के निर्धारित कर्मकाल में कौन-सी तिथि विद्यमान है और उस तिथि के समर्थन में धर्मशास्त्रीय विधान क्या कहता है।उपलब्ध गणना के अनुसार 20 अक्टूबर को सूर्योदय के समय नवमी विद्यमान है और वह प्रातः 9:46 बजे तक रहती है। दूसरी ओर 21 अक्टूबर को सूर्योदय के समय दशमी विद्यमान है तथा वह प्रातः 11:02 बजे तक रहती है। ऐसे में सूर्योदयव्यापिनी दशमी, देवकर्म के पूर्वाह्नकाल और प्रस्तुत धर्मशास्त्रीय प्रमाणों को साथ रखकर देखने पर 21 अक्टूबर 2026 की प्रातः विजयादशमी एवं दुर्गा-विसर्जन का पक्ष पर्याप्त शास्त्रीय आधार के साथ विचारणीय प्रतीत होता है।वहीं तिथि-निर्णय की परंपरा में विभिन्न संप्रदायों, पंचांग-पद्धतियों और कर्म-विधानों के अनुसार सूक्ष्म मतभेद संभव हैं। इसलिए किसी एक मत को अंतिम एवं एकमात्र निष्कर्ष के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय तिथि-गणना, कर्मकाल और संबंधित धर्मशास्त्रीय प्रमाणों को सार्वजनिक विमर्श के सामने रखना अधिक उचित होगा।इस आधार पर 20 अक्टूबर को नवमी-संबंधी पूजन एवं हवन तथा 21 अक्टूबर को सूर्योदयव्यापिनी दशमी में विजयादशमी एवं दुर्गा-विसर्जन का क्रम एक गंभीर एवं शास्त्रसम्मत विकल्प के रूप में सामने आता है। अंतिम आचार-निर्णय में स्थानीय पंचांग, परंपरा और संबंधित कर्मविधान का भी समुचित विचार किया जाना चाहिए।
