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-डाॅ. अरविंद नाथ तिवारी
भारत में चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता का सबसे महत्वपूर्ण आधार हैं। इसलिए जब निर्वाचन आयोग जैसी संवैधानिक संस्था के कामकाज पर सवाल उठते हैं तो उसका राजनीतिक विवाद बनना स्वाभाविक है। सितंबर 2026 में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और निर्वाचन आयोग के दो अन्य आयुक्तों के बीच कथित मतभेदों की खबरों ने इसी बहस को तेज कर दिया है। एक अखबार में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब दस महीनों में आयोग के कुछ निर्णयों पर कम-से-कम 14 बार आपत्तियां दर्ज कीं, इनमें मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर और मतदाता डाटा के केंद्रीकरण जैसे विषय शामिल बताए गए हैं। दूसरी ओर चुनाव आयोग ने कहा है कि आंतरिक विमर्श में अलग-अलग राय आना सामान्य प्रक्रिया है और एसआईआर सहित आयोग के अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए।
यहीं से राजनीतिक सवाल पैदा होता है। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इन रिपोर्टों को अपने पुराने ‘वोट चोरी’ के आरोपों से जोड़ते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग की है। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता प्रभावित हुई है और ज्ञानेश कुमार को पद छोड़कर कथित गड़बड़ियों की जानकारी सामने लानी चाहिए। ये राहुल गांधी और विपक्ष के राजनीतिक आरोप हैं; इन्हें अभी स्थापित तथ्य के रूप में नहीं देखा जा सकता। निश्चित रूप से यह ऐसा विषय है जिसकी स्वतंत्र और पारदर्शी जांच होनी चाहिए। तीन सदस्यीय आयोग में दो सदस्यों द्वारा बार-बार लिखित आपत्ति दर्ज किए जाने की खबर को केवल राजनीतिक बयान कहकर खारिज करना भी उचित नहीं होगा लेकिन दूसरी ओर, आंतरिक असहमति अपने-आप में चुनावी धांधली या ‘वोट चोरी’ का प्रमाण भी नहीं है। आयोग का कहना है कि अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से हुए। इसलिए असली सवाल यह होना चाहिए कि उन आपत्तियों का विषय क्या था, निर्णय लेने की प्रक्रिया क्या रही और क्या उससे किसी पात्र मतदाता का अधिकार प्रभावित हुआ।
राहुल गांधी ने एंटी-इनकंबेंसी समाप्त होने पर भी सवाल उठाया है। लेकिन चुनावी राजनीति में किसी सरकार की लगातार जीत या हार को केवल चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली से जोड़ना राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों की जटिलता को सरल बना देना होगा। मसलन, 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में भाजपा को केवल एक सीट मिली, जबकि अलग-अलग दलों ने शेष सीटें जीतीं। इसी तरह 2026 के कर्नाटक उपचुनावों में कांग्रेस ने बागलकोट और दावणगेरे दक्षिण सीटें जीतीं। इससे कम-से-कम इतना स्पष्ट है कि अलग-अलग राज्यों में मतदाताओं का व्यवहार एक जैसा नहीं है। इसलिए ‘यदि चुनाव में गड़बड़ी है तो अमुक राज्य में विपक्ष क्यों जीता’- यह सवाल राजनीतिक बहस में उठाया जा सकता है लेकिन इससे अकेले किसी आरोप का खंडन या प्रमाण नहीं होता। चुनाव की निष्पक्षता का परीक्षण दस्तावेजों, मतदाता सूची, मतदान प्रक्रिया, बूथ स्तर के आंकड़ों और कानूनी जांच से होना चाहिए।
क्या मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा मांगना उचित है?
यह प्रश्न भी संविधान और कानून के दायरे में देखा जाना चाहिए। मुख्य चुनाव आयुक्त कोई सामान्य सरकारी अधिकारी नहीं हैं। चुनाव आयोग संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत स्थापित संवैधानिक संस्था है और मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश जैसी संवैधानिक सुरक्षा से जुड़ी है। इसलिए किसी राजनीतिक दल या सांगठनिक संगठन द्वारा इस्तीफे की मांग करना अभिव्यक्ति और लोकतांत्रिक विरोध का हिस्सा हो सकता है लेकिन केवल राजनीतिक दबाव के आधार पर संवैधानिक पदाधिकारी को हटाना अलग विषय है। आरोपों की गंभीरता का परीक्षण संसद, न्यायपालिका और निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से होना चाहिए।
क्या आंदोलन अराजकता पैदा कर सकता है?
लोकतंत्र में आंदोलन स्वयं अराजकता नहीं है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन, जनसभा, धरना और सरकार या संवैधानिक संस्थाओं से जवाब मांगना लोकतांत्रिक अधिकारों का हिस्सा हैं। लेकिन किसी भी आंदोलन की वैधता उसकी शांतिपूर्ण प्रकृति और कानून के पालन से जुड़ी होती है। यदि विरोध हिंसा, सरकारी संपत्ति को नुकसान, जबरन बंद या नागरिकों के अधिकारों के उल्लंघन में बदलता है तो स्थिति अलग होगी।
क्या लोकतंत्र खतरे में है?
लोकतंत्र की सुरक्षा किसी एक दल या व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं है। चुनाव आयोग, राजनीतिक दल, न्यायपालिका, संसद, मीडिया और नागरिक समाज-सभी की भूमिका है। चुनाव आयोग से पारदर्शिता की मांग उतना ही आवश्यक है जितना बिना प्रमाण गंभीर आरोपों को अंतिम सत्य मानने से बचना। आज आवश्यकता ‘कौन सही और कौन गलत’ घोषित करने से अधिक सवालों के दस्तावेजी जवाब पाने की है। यदि मतदाता सूची में गड़बड़ी के आरोप हैं तो आंकड़े सार्वजनिक हों। यदि आयोग के भीतर असहमति हुई है तो उसके रिकॉर्ड और कानूनी आधार स्पष्ट हों। यदि एसआईआर से पात्र मतदाता प्रभावित हुए हैं तो शिकायत और अपील की प्रक्रिया पारदर्शी हो और यदि आरोप निराधार हैं तो चुनाव आयोग को भी तथ्यों के साथ उनका खंडन करना चाहिए।
लोकतंत्र की मजबूती न तो केवल सत्ता पक्ष की जीत से सिद्ध होती है और न विपक्ष के आरोपों से लोकतंत्र समाप्त मान लिया जा सकता है। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब मतदाता का विश्वास, चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता और संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही- तीनों साथ दिखाई दें, यही मौजूदा विवाद की सबसे बड़ी कसौटी है।
