बोल नहीं सकती तो क्या हुआ, लिखकर भी रख सकती हैं अपना पक्ष; छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी
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नई दिल्ली, 16 सितंबर (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने मंगलवार को कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल करियर निर्माण नहीं है। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य निर्माण है। मनुष्य निर्माण से ही राष्ट्र निर्माण संभव है। भारत में बहुत से संतों की नियमित शिक्षा नहीं हुई लेकिन उन्होंने समाज का नेतृत्व किया। उनका मनुष्यता का स्तर बहुत ऊंचा था। इसी के चलते आज आधुनिक शिक्षा के साथ मानवता के गुणों को बढ़ाने वाली शिक्षा की भी आवश्यकता है।
डॉ. भागवत ने आई.आई.एल.एम. विश्वविद्यालय एवं बेनयान ट्री विद्यालय के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित संवाद कार्यक्रम में कक्षा 10 से स्नातकोत्तर (पोस्ट ग्रेजुएशन) तक के छात्रों से संवाद कर उनके प्रश्नों के उत्तर दिए। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि हाल ही में फिल्म ‘हनुमान अंश’ आई। इसमें ‘नीब करोरी बाबा’ हैं। ‘स्टीव जॉब्स’ भी उनसे मिलने आए थे। स्वामी विवेकानंद के गुरु रामकृष्ण परमहंस की भी स्कूली शिक्षा नहीं हुई थी।
शिक्षकों व छात्रों को संबोधित करते हुए सरसंघचालक ने बताया कि उनका व्यक्तिगत अनुभव है कि नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी से अधिक ईमानदार है, उनमें प्राकृतिक रूप से अधिक साहस है। प्रतिभा पलायन के विषय पर छात्रों का आह्वान करते हुए कहा कि विदेशों में आपको सबकुछ मिल जाएगा, लेकिन आपकी पहचान आपके देश से है। आपको अपने देश से बहुत कुछ मिला है। भारत के अन्न-जल से हमें अपनी देह मिली है। जितना देह के लिए आवश्यक है, उतना अपने लिए रखें और शेष समाज के लिए, देश के लिए अर्पित करें। उन्होंने कहा कि भारत को विश्व की सैन्य या आर्थिक महाशक्ति नहीं बनना है। भारत को विश्वगुरु के सिंहासन पर पुनर्स्थापित करना है। भारत में ‘मनुष्यता का ज्ञान’ इसकी पहचान है।
कार्यक्रम की प्रस्तावना आई.आई.एल.एम के चेयरमैन अनिल राय ने रखी।
