नई दिल्ली, देश भर में पीढ़ियों से घी लगभग एक ही तरीके से बनाया जाता रहा है। आज भले ही इसे लाखों घरों तक पहुंचाने के लिए इसे बड़े पैमाने पर बनाया जाता हो, लेकिन इसकी पारंपरिक प्रक्रिया में कोई बदलाव नहीं आया है। गोवर्धन घी भी इसी पारंपरिक तरीके से तैयार किया जाता है, जो पांच अलग-अलग चरणों से होकर गुजरता है। हालांकि, यदि आप किसी ऐसे व्यक्ति से पूछें, जिसने इस प्रक्रिया को बेहतर बनाने में वर्षों बिताए हैं, तो वह आपको बताएगा कि इन पांचों चरणों में से एक सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।
1. दूध खरीद कर उबालना
घी बनाने की शुरुआत ताज़े, अच्छी गुणवत्ता वाले दूध से होती है। दूध को छानकर अच्छी तरह उबाला जाता है ताकि उसमें मौजूद कीटाणु खत्म हो जाएं और आगे की प्रक्रिया से पहले दूध तैयार हो जाए। यदि इस चरण में कोई गलती हो जाए, तो उसके बाद के हर चरण में समस्या आ जाती है।
2. दही जमाना
उबले हुए दूध को विशेष तापमान तक ठंडा किया जाता है और उसमें थोड़ा सा जामन (कल्चर) डालकर रात भर के लिए दही जमने के लिए छोड़ दिया जाता है। यह तरीका घर पर दही जमाने जैसा ही है, बस इसे बड़े पैमाने पर और समय तथा एकरूपता बरकरार रखते हुए किया जाता है।
3. मथना
दही को पारंपरिक ‘बिलोना’ तरीके की मशीनी तकनीक से अच्छी तरह मथा जाता है ताकि छाछ और मक्खन अलग-अलग हो जाए। यह चरण कितनी सफाई से किया जाता है, इसी से तय होता है कि आखिर में घी की बनावट कैसी रहेगी।
4. मक्खन अलग करना
सफेद मक्खन को बची हुई छाछ और मट्ठे से अच्छी तरह अलग किया जाता है। इसी सावधानी से करना होता है, लेकिन इसमें अशुद्धियों को छानकर अलग किया जाता है।
5. गर्म करना और शोधन करना (क्लेरिफिकेशन)
यह सबसे ज़रूरी चरण है। अलग किए गए मक्खन को स्टेनलेस-स्टील के बर्तनों में धीरे-धीरे गर्म किया जाता है, जिससे बची हुई नमी उड़ जाती है और दूध का ठोस हिस्सा हलके सुनहरे रंग का हो जाता है। यही वह चरण है जो असल में शुद्धता तय करता है। यदि जल्दबाज़ी की जाए, तो नमी अंदर ही रह जाती है, जिससे घी के जल्दी खराब होने की संभावना रहती है। अधिक गर्म करने पर घी जल जाता है और कम गर्म करने पर घी को न वह सुनहरा रंग मिलता है न ही उसकी वह सौंधी खुशबू मिल पाती ही। यदि