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संजय अग्रवाल
आज जब समाज भौतिकता की दौड़ में अपनी जड़ों से दूर होता दिखता है, तब सिनेमा जैसे माध्यम से यदि कोई रचना सनातन धर्म की आत्मा को छू ले, तो वह मात्र मनोरंजन नहीं रह जाती। वह संस्कृति का वाहक बन जाती है। 7 अगस्त 2026 को सिनेमाघरों में आई फिल्म **हनुमान अंश** ठीक ऐसी ही कृति है। यह फिल्म नीम करोली बाबा, जिन्हें भक्त महाराज-जी कहते हैं, के प्रारंभिक जीवन पर आधारित है। निर्देशक विशाल चतुर्वेदी ने इसे न तो चमत्कारों का तमाशा बनाया है और न ही दिखावटी भक्ति का प्रदर्शन। उन्होंने एक साधक की यात्रा दिखाई है—माँ के वियोग से राम की खोज तक, और राम की खोज से हनुमान की सेवा तक।
शीर्षक स्वयं में गहरा अर्थ रखता है। **हनुमान अंश** का अर्थ है हनुमान का अंश, उनका सार। फिल्म पूछती है कि क्या यह कथा केवल भगवान हनुमान की है, या नीम करोली बाबा की? उत्तर दोनों में है। बाबा हनुमान के परम भक्त थे। उनका जीवन राम नाम, सीता-राम के जाप और निःस्वार्थ सेवा का जीवंत प्रमाण है। फिल्म कहती है कि ईश्वर ऊपर देखने से नहीं, आसपास के पीड़ित को देखने से मिलता है। जो राम को प्रेम करता है, वह हनुमान की तरह सेवा करता है।
कहानी बीसवीं सदी के आरंभिक भारत की है। तेरह वर्षीय लक्ष्मण नारायण, जिन्हें बाद में लक्ष्मण दास कहा गया, ब्रज से माँ के निधन के बाद निकल पड़ते हैं। उन्हें विश्वास है कि माँ राम के पास गई हैं और हनुमान ही उन्हें राम तक पहुँचा सकते हैं। वे मंदिरों, वनों, नदियों और गाँवों में भटकते हैं। मौन, तप और प्रकृति से सीखते हैं। एक वैष्णव मंदिर में महंत उन्हें विशेष मानते हैं, पर बालक सुख-सुविधा और स्तुति ठुकरा देता है। वह कहता है कि मंदिर भी बंधन बन सकता है। वर्षों की साधना के बाद जब वे युवा होते हैं, तब प्रसिद्ध रेलवे घटना घटती है। बिना टिकट प्रथम श्रेणी में बैठे साधु को अंग्रेज अधिकारी उतरवा देते हैं। ट्रेन रुक जाती है। इंजन ठीक है, पर चलती नहीं। क्षमायाचना के बाद बाबा चार टिकट निकाल देते हैं और दो शर्तें रखते हैं—भारत में किसी संत को टिकट न होने पर न उतारा जाए, और उस स्थान पर स्टेशन बने। वही स्थान नीम करौरी स्टेशन बना और लक्ष्मण दास नीम करोली बाबा कहलाए।
यह घटना फिल्म का केंद्र नहीं, उसका प्रतीक है। असली संदेश है—प्रेम करो, सेवा करो, राम बोलो। भूखे को भोजन दो, पीड़ित का साथ दो, और चुपचाप आशीर्वाद दो। फिल्म बड़े-बड़े विरोधी या अति नाटकीय दृश्य नहीं दिखाती। वह छोटे-छोटे कर्मों से बड़ा सत्य बताती है। शोभिनव सत्या ने बाबा की भूमिका में जो सादगी और आंतरिक शक्ति दिखाई है, वह अभिनय से अधिक साधना लगती है। चंदन आनंद, पूर्णिमा तिवारी, अनिल रस्तोगी और अन्य कलाकारों ने कहानी को जीवंत रखा है। संगीत साधु सुशील तिवारी का है, जो भक्ति को शोर नहीं, अनुभव बनाता है।
फिल्म मात्र दो करोड़ रुपये के बजट में बनी। आरंभ में सिनेमाघरों में भीड़ कम रही। पर मुँह-जबानी प्रचार से तीसरे सप्ताह के बाद दर्शक उमड़ पड़े। 26वें दिन तक भारत में नेट कलेक्शन पचास करोड़ से ऊपर निकल चुका था और फिल्म चलती रही। यह आँकड़ा व्यापार का नहीं, आस्था का प्रमाण है। जब बड़े बजट और तड़क-भड़क वाली फिल्में संघर्ष कर रही थीं, तब यह सादी कथा परिवारों को थिएटर खींच लाई। बच्चे, युवा और वृद्ध एक साथ बैठकर राम नाम सुन रहे हैं। यही सनातन की शक्ति है।
वर्ल्ड हिन्दू फेडरेशन की दृष्टि से यह फिल्म महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हिंदू समाज को याद दिलाती है कि धर्म केवल पूजा-पाठ नहीं, आचरण है। आज जब हमारी संत परंपरा को या तो अंधविश्वास कहा जाता है या पश्चिमी चश्मे से देखा जाता है, तब नीम करोली बाबा जैसे संत का जीवन सामने लाना आवश्यक है। बाबा का संदेश विश्वव्यापी रहा। कैंची धाम आज भी लाखों श्रद्धालुओं का केंद्र है। उनकी शिक्षा सरल है—सब एक हैं, प्रेम करो, सेवा करो। फिल्म इसी शिक्षा को नई पीढ़ी तक पहुँचाती है। निर्देशक ने कैंची धाम से जुड़ी आस्था का सम्मान रखा और शोध के आधार पर कथा बुनी। यह त्रयी की पहली कड़ी है। आगे बाबा के जीवन के अन्य अध्याय भी आने वाले हैं।
कुछ लोग कहेंगे कि यह केवल भक्ति फिल्म है। मैं कहूँगा कि यह संस्कृति का दस्तावेज है। जब सिनेमा घर-घर में हनुमान चालीसा और राम नाम पहुँचाए, तब वह राष्ट्र की चेतना जगाता है। फिल्म सिखाती है कि भगवान को पाने के लिए संसार छोड़ना जरूरी नहीं। संसार में रहकर सेवा करना ही सच्ची भक्ति है। माँ की याद से शुरू हुई यात्रा अंत में समस्त मानवता की माँ बन जाती है।
मैं प्रदेश के सभी सनातनी परिवारों, युवाओं और संगठनों से आग्रह करता हूँ कि इस फिल्म को परिवार के साथ देखें। बच्चों को समझाएँ कि हनुमान अंश कोई कल्पना नहीं, हमारे संत समाज की जीवित परंपरा है। सिनेमाघर में जाकर केवल फिल्म न देखें, उस भाव को अपने आचरण में उतारें। भूखे को भोजन दें, कमजोर का साथ दें और राम नाम का जाप करें।
हनुमान अंश हमें याद दिलाती है कि कलियुग में भी हनुमान का अंश जीवित है—उनके भक्तों के रूप में, सेवा के रूप में और अटूट आस्था के रूप में। जय श्री राम। जय बजरंगबली।
( लेखक वर्ल्ड हिन्दू फेडरेशन मध्यप्रदेश के अध्यक्ष हैं)
