महाराष्ट्र के नासिक में राष्ट्रपति ने सिंहस्थ धर्मध्वज फहरा कर नासिक-त्र्यंबकेश्वर कुंभ पर्व का किया शुभारंभ
Spread the love मुंबई, 31 अक्टूबर। महाराष्ट्र के...
Spread the love मुंबई, 31 अक्टूबर। महाराष्ट्र के...
Spread the loveराशिफल : 01 नवंबर , 2026...
Spread the love – उप मुख्यमंत्री ने सीधी,...
याचिकाकर्ता ने अपने पिता की मौत के बाद ‘दया के आधार पर नौकरी’ के लिए अपनी अर्ज़ी खारिज किए जाने को चुनौती दी थी। उसके पिता बैंक ऑफ़ महाराष्ट्र में डिप्टी मैनेजर के तौर पर काम करते थे। बैंक ने उसका दावा इस आधार पर खारिज किया कि शादीशुदा होने के कारण उसे पति पर निर्भर माना जाएगा। इसलिए उसे दिवंगत कर्मचारी के आश्रित परिवार के सदस्य के तौर पर नहीं माना जा सकता। याचिकाकर्ता का तर्क था कि बैंक की नीति में शादीशुदा बेटियों को स्पष्ट रूप से बाहर नहीं रखा गया और असल में वह आर्थिक रूप से अपने पिता पर निर्भर थी। बैंक की ‘दया के आधार पर नौकरी’ की नीति की जांच करने पर कोर्ट ने पाया कि इसमें ‘आश्रित परिवार के सदस्य’ की परिभाषा में बेटी को शामिल किया गया, जिसमें शादीशुदा और अविवाहित बेटियों के बीच कोई अंतर नहीं किया गया।
कोर्ट ने यह भी गौर किया कि याचिकाकर्ता ने अपने आवेदन में खास तौर पर कहा कि निजी आर्थिक हालात के कारण वह अपने पिता पर निर्भर थी और बैंक ने इसके उलट कोई सबूत पेश नहीं किया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि वैवाहिक स्थिति के आधार पर शादीशुदा बेटियों को बाहर रखना संविधान के तहत गलत जेंडर स्टीरियोटाइप (लिंग-आधारित रूढ़िवादी सोच) पर आधारित है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 15(1) का उल्लंघन करता है। हाईकोर्ट ने कहा कि किसी बेटी को सिर्फ़ शादीशुदा होने के आधार पर बाहर नहीं किया जा सकता। यह स्पष्ट रूप से मनमाना है।
