पुरी,। ओडिशा के पुरी में भगवान जगन्नाथ की विश्वप्रसिद्ध रथयात्रा 16 जुलाई से शुरू होकर 24 जुलाई तक चलेगी। इस नौ दिवसीय धार्मिक उत्सव में देश-विदेश से 10 लाख से अधिक श्रद्धालुओं के शामिल होने की संभावना है। रथयात्रा को लेकर पुरी में तैयारियों का दौर अंतिम चरण में हैं, तो वहीं होटल और लॉज महीनों पहले ही पूरी तरह बुक हो चुके हैं। ऐसे में प्रोफेसर डॉ शेख मकबूल इस्लाम की चर्चा भी हो रही है, जो कठोपनिषद् के प्रसिद्ध श्लोक का हवाला देते हुए कहते हैं कि जब शरीर स्वयं रथ है, बुद्धि सारथी है और आत्मा उसका स्वामी है, तो अलग रथ की आवश्यकता नहीं।
विश्वप्रसिद्ध रथ यात्रा में शामिल होने वाले श्रद्धालुओं को लेकर जिला प्रशासन का कहना है, कि इस वर्ष फरवरी से ही होटल बुकिंग शुरू हो गई थी। मंदिर और रथयात्रा मार्ग के आसपास स्थित होटलों की सर्वाधिक मांग रही है। खासकर जिन होटलों की बालकनी या खिड़कियां रथयात्रा मार्ग की तरफ खुलती हैं, उनके कमरे सबसे पहले बुक हो गए। जैसे ही मांग बढ़ी वैसे ही किराए में भी भारी उछाल आ गया। सामान्य दिनों में 1,500 से 2,000 रुपये प्रतिदिन से मिलने वाले कमरे रथयात्रा के दौरान तीन दिनों के लिए 50 हजार रुपये तक में बुक किए जा रहे हैं। पूरे पुरी शहर में लगभग 1,200 होटल और लॉज हैं, जिनमें अधिकांश पहले से बुक हो चुके हैं।
हावड़ा की रथयात्रा ने खींचा ध्यान
इसी बीच पश्चिम बंगाल के हावड़ा की एक अनोखी रथयात्रा भी लोगों का ध्यान आकर्षित कर रही है। दरअसल यहां न तो विशाल रथ बनाया जाता है और न ही उसे रस्सियों से खींचा जाता है। बल्कि कोलकाता के सेंट पॉल कैथेड्रल मिशन कॉलेज के बांग्ला विभाग के प्रोफेसर डॉ. शेख मकबूल इस्लाम भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन के विग्रह को अपनी गोद में लेकर करीब 400 मीटर की परिक्रमा करते हैं। इस अनूठी यात्रा में हिंदू, मुस्लिम और ईसाई समुदाय के लोग समान रूप से भाग लेते हैं। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार डॉ. शेख मकबूल इस्लाम वर्ष 1992 से भगवान जगन्नाथ पर शोध कर रहे हैं और इस विषय पर 14 से अधिक पुस्तकें लिख चुके हैं। वर्ष 1996 से उनके घर में भगवान जगन्नाथ का विग्रह स्थापित है, जबकि 2009 से वे हर वर्ष इस विशेष परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं।
इस अनूठी परंपरा का आधार है कठोपनिषद् का प्रसिद्ध श्लोक
वे अपनी परंपरा का आधार कठोपनिषद् के प्रसिद्ध श्लोक आत्मानं रथिनं विद्धि, शरीरं रथमेव तु… को बताते हैं। उनके अनुसार, जब शरीर स्वयं रथ है, बुद्धि सारथी है और आत्मा उसका स्वामी है, तो अलग रथ की आवश्यकता नहीं। डॉ. इस्लाम पूरी तरह शाकाहारी हैं और पुरी की परंपरा के अनुसार भगवान जगन्नाथ को 35 प्रकार के सात्विक भोग अर्पित करते हैं। उनकी यह पहल धार्मिक समरसता और सांस्कृतिक एकता का अनूठा उदाहरण मानी जाती है।