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नई दिल्ली, 25 मई 2026। देश की राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किला मैदान में रविवार को जनजातीय अस्मिता, सांस्कृतिक गौरव और सामाजिक चेतना का एक विराट दृश्य देखने को मिला, जब भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती वर्ष के अवसर पर आयोजित राष्ट्रीय जनजाति सांस्कृतिक समागम में देशभर से हजारों जनजातीय प्रतिनिधि, युवा, सामाजिक कार्यकर्ता और पारंपरिक समुदाय एक मंच पर जुटे। जनजाति सुरक्षा मंच एवं जनजाति जागृति समिति द्वारा आयोजित इस भव्य कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे, जबकि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की उपस्थिति ने कार्यक्रम को विशेष महत्व प्रदान किया। लाल किले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में पारंपरिक वेशभूषा, लोक वाद्ययंत्रों और जनजातीय संस्कृति की विविध रंगों से सजा यह आयोजन केवल एक सांस्कृतिक समागम नहीं, बल्कि देश की मूल सांस्कृतिक चेतना और जनजातीय पहचान के संरक्षण का राष्ट्रीय संदेश बनकर उभरा।
अपने संबोधन में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि जनजातीय समाज केवल प्रकृति का रक्षक नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा का सबसे प्राचीन और जीवंत स्वरूप है। उन्होंने कहा कि सदियों से जल, जंगल और जमीन की रक्षा करते हुए जनजातीय समाज ने प्रकृति और मानव जीवन के बीच संतुलन बनाए रखने का कार्य किया है और आज पूरी दुनिया पर्यावरण संकट से जूझ रही है, ऐसे समय में जनजातीय जीवन दर्शन मानवता को टिकाऊ विकास का रास्ता दिखा सकता है। मुख्यमंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ की पहचान उसकी समृद्ध जनजातीय संस्कृति से जुड़ी हुई है, जहां 42 प्रकार की जनजातियां निवास करती हैं और राज्य का लगभग 44 प्रतिशत क्षेत्र वनाच्छादित है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर राष्ट्र निर्माण तक जनजातीय समाज का योगदान अतुलनीय रहा है और भगवान बिरसा मुंडा तथा छत्तीसगढ़ के अमर शहीद वीर नारायण सिंह जैसे महानायकों ने अपनी संस्कृति, स्वाभिमान और अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष और बलिदान का इतिहास रचा।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि उनकी सरकार जनजातीय संस्कृति, परंपराओं और जीवन मूल्यों को संरक्षित करने के लिए निरंतर कार्य कर रही है। उन्होंने बताया कि नया रायपुर में आयोजित ‘आदि परब’, बस्तर पंडुम और बस्तर ओलंपिक जैसे आयोजन केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि जनजातीय प्रतिभा, परंपरा और पहचान को राष्ट्रीय मंच देने का प्रयास हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी समाज की संस्कृति उसकी भाषा से जीवित रहती है, इसलिए छत्तीसगढ़ सरकार गोंडी, हल्बी और सादरी जैसी जनजातीय भाषाओं में बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा देने की दिशा में विशेष पहल कर रही है, ताकि नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी रह सके। साथ ही बस्तर से सरगुजा तक देवगुड़ी और मातागुड़ी जैसे पारंपरिक आस्था केंद्रों के संरक्षण और विकास का कार्य भी तेजी से किया जा रहा है।
अपने संबोधन में मुख्यमंत्री ने जनजातीय समाज की सांस्कृतिक पहचान और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण विषय को भी प्रमुखता से उठाया। उन्होंने कहा कि समाज के भीतर यह भावना लगातार प्रबल हो रही है कि जो लोग अपनी मूल जनजातीय परंपराओं, संस्कृति और धर्म को छोड़ चुके हैं, उन्हें अनुसूचित जनजाति की सूची से बाहर किए जाने पर गंभीरता से विचार होना चाहिए, ताकि आरक्षण और सरकारी सुविधाओं का वास्तविक लाभ उन समुदायों तक पहुंचे जो आज भी अपनी मूल पहचान और परंपराओं को संरक्षित किए हुए हैं। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि यह मांग किसी समुदाय के विरोध में नहीं, बल्कि जनजातीय समाज की अस्मिता, अधिकारों और सांस्कृतिक अस्तित्व की रक्षा की भावना से जुड़ी हुई है तथा इसे लोकतांत्रिक और संवैधानिक दायरे में उठाया जा रहा है।
कार्यक्रम के दौरान देश के विभिन्न राज्यों से आए जनजातीय कलाकारों ने पारंपरिक नृत्य, लोक संगीत और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से भारत की समृद्ध जनजातीय विरासत की जीवंत झलक प्रस्तुत की। लाल किला मैदान में दिनभर गूंजते मांदर, ढोल और पारंपरिक लोकधुनों के बीच यह समागम केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि जनजातीय समाज की एकता, स्वाभिमान और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का सशक्त राष्ट्रीय घोष बनकर सामने आया।
