छत्तीसगढ़ में श्रम आधारित उद्योगों को बढ़ावा देकर युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर सृजित कर रही सरकार : साय
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मुंबई । बॉलीवुड फिल्म दो दीवाने शहर में नैना की भूमिका निभाने वाली अभिनेत्री संदीपा धर ने सोशल मीडिया पर एक ऐसा अनुभव साझा किया है, जिसने बचपन की अनगिनत यादों को फिर से जीवंत कर दिया है। अपने भावनात्मक संदेश में संदीपा ने उस सच को उजागर किया, जिससे लगभग हर बच्चा कभी न कभी गुज़रा होता है। फिल्म में वह अभिनेत्री म्रनाल ठाकुर की बहन का किरदार निभा रही हैं और उसी संबंध की जटिलता को दर्शाने वाला उनका यह पोस्ट दर्शकों के बीच चर्चा का विषय बन गया है। संदीपा ने लिखा कि “अपने भाई या बहन को देखो, वह कितना अच्छा है…” जैसे वाक्य बचपन की वे अनकही यादें तुरंत सामने ला देते हैं, जिनमें तुलना, दबाव और आत्मसंघर्ष छिपा होता है। उन्होंने बताया कि फिल्म में नैना और रोशनी का रिश्ता इसी निरंतर तुलना की पीड़ा से गुजरता है। रोशनी को बार-बार यह एहसास दिलाया जाता है कि वह ‘काफी नहीं’ है, जबकि नैना पर ‘बहुत परफेक्ट’ बने रहने का बोझ डाल दिया जाता है। इसी दुविधा के बीच दोनों पात्र अपनी-अपनी पहचान खोजने की कोशिश में भावनात्मक रूप से बिखरते जाते हैं। नैना का किरदार निभाते हुए संदीपा को एहसास हुआ कि निरंतर की जाने वाली तुलना किसी इंसान को भीतर से कैसे तोड़ देती है। उनके अनुसार, तुलना भाई-बहनों के बीच एक अदृश्य प्रतिस्पर्धा पैदा कर देती है, जो प्यार और अपनापन को शर्तों में बदल देती है। माता-पिता, रिश्तेदार या शिक्षक अक्सर अनजाने में “अपनी बहन जैसी बनो” जैसे शब्द कहते हैं, लेकिन वे नहीं समझ पाते कि ये छोटी-सी बातें किसी बच्चे की पूरी सोच, आत्मविश्वास और रिश्तों को लंबे समय तक प्रभावित करती हैं। ऐसे शब्द दिल में ऐसे घाव छोड़ जाते हैं, जिन्हें भरने में कई साल लग जाते हैं। संदीपा का संदेश दर्शाता है कि फिल्म ‘दो दीवाने सहर में’ सिर्फ एक रोमांटिक कहानी नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक सच्चाई को सामने लाती है। तुलना की संस्कृति से पैदा होने वाले दर्द और संघर्ष को यह फिल्म संवेदनशीलता से प्रस्तुत करती है। बचपन से शुरू होने वाली यह मानसिक लड़ाई व्यक्ति के व्यक्तित्व और आत्मसम्मान को आकार देती है।
