(सुरेश सन्नाटा)
कभी-कभी किसी साहित्यकार की जुबान से निकली पीड़ा किस तरह भविष्य की ओर इंगित कर जाती है कहा नहीं जा सकता और आज एक हास्य चुटकी सार्थक होकर बयां कर रही है कि…… महंगाई जीने नहीं देती और पत्नी की करवा चौथ मरने भी नहीं देती…….. तब भला आदमी करे भी तो क्या…… क्योंकि जिस सरकार का नारा…… सबका साथ सबका विकास…… की बात भले ही जोर – शोर से करते नहीं थकता है उस सरकार के राज में आज महंगाई आदमी के सिर चढ़कर नृत्य कर रही है । उसे पहले ही अपने परिवार का लालन – पालन करना जोखिम भरा लग रहा है ….ऐसे में सरकारी फरमान अब उसकी पेट पूजा याने आटे- दाल पर भी टैक्स थोपकर कहर ढाने की तैयारी कर चुका है जो निम्न मध्यम वर्ग को रोजी – रोटी देने की बजाय भूखे सोने की नौबत लाने पर उतारू है। जिसे कतई न्याय संगत तो नहीं कहा जाएगा……. पर कहते हैं जब सरकार गूंगी बहरी बनकर सिर्फ और सिर्फ तानाशाही का राज चलाने लगती है तब प्रजा की सुनने वाले भी गूंगे बहरे बन जाते हैं …..।।शायद इसी हालात से आज देश गुजर रहा है । यात्रा याने आम आदमी की यात्रा का रेल से किया जाने वाला सफर अभी भी कोरोना के समय किए गए भाड़ा वृद्धि से बाहर नहीं निकल पाया है …..तो वाहनों के ईधन में भी आग लग चुकी है…… बेरोजगारी मुंह चिढ़ा रही है …….तो महिलाओं के चौके से महंगाई का गहरा नाता हो गया है….. रसोई गैस हो या अन्य खाद्य सामग्री उसे ऐसी नजर लगी है कि वह दिन – प्रतिदिन आम आदमी की जेब से दूर होती जा रही है…….. पहले की कमर तोड़ महंगाई की त्रासदी से कराह रहा निम्न व मध्यम वर्ग कहें या आम आदमी ऐसा उपभोक्ता है जिसकी पेट पूजा याने आटे, दाल पर भी जीएसटी का जिन्न बिठाकर सरकार….. जले पर नमक लगाने वाली…… कहावत चरितार्थ कर रही है । क्योंकि जीएसटी काउंसिल द्वारा प्रीपेक्ड और लेबल्ड अनाज दलहन के विक्रय पर पांच फ़ीसदी जीएसटी लगाने की अनुशंसा कर 18 जुलाई से इसे अमल में लाने की पूर्णरूपेण मंशा जाहिर कर दी गई है । जो गरीबों के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं होकर उसकी पेट पूजा पर कुठाराघात ही करेगी। इसलिए पुनर्विचार कर इसे निरस्त किया जाना ही जनहितार्थ जरूरी है।
