कांग्रेस का भीड़तंत्र से अराजकता पैदा कर लोकतंत्र खत्म करने प्रयास कभी सफल नहीं होगा : उप मुख्यमंत्री अरुण साव
Spread the loveबिलासपुर- सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री...
Spread the loveबिलासपुर- सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री...
Spread the loveरायपुर- आज छत्तीसगढ़ अपना 26वां स्थापना...
Spread the loveरायपुर – कोरबा जिले में एक...
भागलपुर, 01 नवंबर । गंगा और कोसी की विनाशकारी बाढ़ तथा भीषण कटाव के थपेड़ों को झेलने के बाद अब दियारा क्षेत्र के किसानों के चेहरों पर उम्मीद की चमक लौटने लगी है। जैसे ही दोनों नदियों की मुख्य धारा अपने निर्धारित मार्ग की ओर लौटने लगी है, वैसे ही दियारा की उपजाऊ और रेतीली गंग बरार भूमि पर कृषि गतिविधियों ने रफ्तार पकड़ ली है।
इसी कड़ी में देश भर में अपने बेमिसाल स्वाद के लिए प्रसिद्ध भागलपुरी परवल की खेती ने एक बार फिर तटीय इलाकों में दस्तक दे दी है। दियारा की बेहद जरखेज और नमी से भरपूर मिट्टी में परवल की लत्ती को लगाने के लिए खेतों में कोड़नी का काम युद्ध स्तर पर शुरू हो गया है। किसान समय का मोल समझते हुए मजदूरों की बड़ी टोलियां लेकर खेतों को दुरुस्त करने में जुट गए हैं।
बाढ़ के बाद जमीन में बची प्राकृतिक नमी और रेतीली दोमट मिट्टी परवल की शुरुआती बढ़वार के लिए अमृत मानी जाती है, बशर्ते खेतों में जलभराव न हो और जलनिकासी की उत्तम व्यवस्था हो। चूंकि इस खेती में बीज के बजाय पुरानी लताओं के टुकड़ों का इस्तेमाल किया जाता है, इसलिए किसान काफी पहले से ही उत्तम रोपण सामग्री जुटाने में लग जाते हैं।
उल्लेखनीय है कि भागलपुर जिले में रिमोट सेंसिंग और जीआईएस तकनीक से हुए हालिया अध्ययनों के अनुसार, जिले में कुल दियारा क्षेत्र लगभग 1073.04 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। भौगोलिक बुनावट और मिट्टी की उम्र (सैकड़ों वर्षों के जमाव) के आधार पर इसे दो श्रेणियों में बांटा गया है।
पुरानी दियारा भूमि करीब 203.26 वर्ग किलोमीटर में फैली है, जो मुख्य रूप से जिले के 6 प्रमुख ब्लॉकों के अंतर्गत आती है। यह अपेक्षाकृत अधिक स्थिर मानी जाती है। वहीं नई दियारा भूमि विशाल क्षेत्र लगभग 869.78 वर्ग किलोमीटर में विस्तृत है, जो जिले के 13 ब्लॉकों को कवर करता है। यहां हर साल नदियां नई गाद और बालू लाती हैं। हालांकि, हर साल आने वाली बाढ़ और कटाव के कारण दियारा में परवल की खेती का कोई स्थायी या सटीक सरकारी आंकड़ा उपलब्ध नहीं हो पाता है, क्योंकि नदी की प्रकृति के अनुसार फसलों का रकबा प्रतिवर्ष बदलता रहता है।
दियारा में खेती करना किसी जोखिम भरे खेल से कम नहीं है। यहां जमीन की उपलब्धता कभी स्थायी नहीं होती; नदी का तीव्र कटाव पल भर में किसी किसान की जमीन लील जाता है, तो वहीं दूसरी तरफ नई उपजाऊ जमीन (सोरार) उभर आती है। इन तमाम भौगोलिक चुनौतियों के बावजूद गंगा और कोसी के तटीय क्षेत्रों में परवल की खेती लंबे समय से लाखों किसानों की आजीविका का मुख्य सहारा रही है।
भागलपुर के साथ-साथ बिहार के अन्य प्रमुख तटीय जिलों जैसे कटिहार (जहां कई मौजों की जमीन पर मौसमी खेती होती है), बेगूसराय, पटना और वैशाली के दियारा इलाकों में भी परवल की बंपर खेती की जाती है। वहीं दूसरी ओर, सहरसा, सुपौल और मधेपुरा जैसे जिलों में कोसी नदी की बदलती धाराओं और अप्रत्याशित स्वभाव के कारण किसानों को और भी ज्यादा कठिन कृषि चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
दियारा की रेतीली जमीन केवल परवल तक ही सीमित नहीं रहती। आगामी महीनों में इन खेतों में परवल की लताओं के बीच या उनके आसपास तरबूज, खरबूज, ककड़ी, खीरा, कद्दू, करेला, मकई और कलाई (उड़द) जैसी अन्य नकदी और मौसमी फसलें भी बड़े पैमाने पर लहलहाती दिखेंगी।
किसानों का कहना है कि यदि मौसम ने साथ दिया और समय पर सिंचाई व लत्तियों की देखरेख हो गई, तो इस बार भागलपुरी परवल देश की मंडियों में समय से पहुंचकर किसानों की झोली खुशियों से भर देगा।
