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Spread the love नई दिल्ली, 16 अक्टूबर ।...
न्यायालय ने दादी को नहीं, मां को सौंपी कस्टडी
प्रयागराज, 16 अक्टूबर । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि कम उम्र के ऐसे बच्चे, जिसे लंबे समय तक उसकी मां से दूर रखा गया हो, उसकी पसंद को अभिरक्षा तय करने का निर्णायक आधार नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि छह साल का बच्चा अपने भावनात्मक और शारीरिक हितों को समझते हुए स्वतंत्र रूप से उचित निर्णय लेने में सक्षम नहीं होता। केवल इसलिए कि दादी ने बच्चे की देखभाल की है, उन्हें मां से बेहतर अभिरक्षा का अधिकार नहीं मिल जाता। जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने आगरा की फैमिली कोर्ट का फैसला रद्द करते हुए बच्चे की अभिरक्षा तत्काल उसकी मां को सौंपने का निर्देश दिया। साथ ही, दादी को बच्चे से मिलने का अधिकार भी दिया गया।
मामले के अनुसार महिला के पति की वर्ष 2020 में मृत्यु हो गई। उस समय उनका बेटा महज आठ महीने का था। महिला का आरोप था कि बीमा दावा दिलाने के बहाने उससे एक खाली कागज पर हस्ताक्षर कराए गए और बाद में उसका इस्तेमाल एक कथित फर्जी समझौता तैयार करने में किया गया। इस समझौते के जरिए बच्चे को उसकी दादी के पास रखने की बात कही गई। महिला ने आरोप लगाया कि इसके बाद उसे अपने बेटे से मिलने तक नहीं दिया गया। महिला ने बच्चे की अभिरक्षा पाने के लिए संरक्षक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 की धाराओं 7 और 25 के तहत फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की थी। हालांकि, अदालत ने उसकी याचिका खारिज की। इसके बाद महिला ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील दाखिल की।
दादी की ओर से दलील दी गई कि मां ने बच्चे को छोड़ दिया था और अब बच्चा उनके साथ रहने का आदी हो चुका है। उन्होंने बच्चे के बयान, कथित समझौते और पिता की वसीयत का भी हवाला दिया, जिसमें दादी को संरक्षक बनाने की बात कही गई। उच्च न्यायालय ने कहा कि बच्चे के हितों का निर्धारण केवल उसके बयान के आधार पर नहीं किया जा सकता। अदालत ने इस आशंका को भी महत्वपूर्ण माना कि मां से लंबे समय तक दूर रखे जाने के कारण बच्चे को प्रभावित किया गया हो सकता है।
पीठ ने कहा, “छह साल की कम उम्र के बच्चे को उसकी मां से मिलने के अवसर से वंचित रखा गया। ऐसे में उसके बयान के आधार पर उसके कल्याण का निर्णय नहीं किया जा सकता। इस उम्र में बच्चा अपने भावनात्मक और शारीरिक हितों के बारे में समझदारी भरी पसंद तय करने में सक्षम नहीं होता।” अदालत ने कहा कि मां और बच्चे के बीच प्राकृतिक संबंध का विशेष महत्व है। बच्चे को उसकी मां से अलग रखना, विशेष रूप से इतनी कम उम्र में, उसे अपने माता-पिता को जानने के स्वाभाविक अधिकार से वंचित करने जैसा है।
पीठ ने यह भी गौर किया कि मां ने बच्चे की अभिरक्षा से वंचित होने के बाद अदालत का दरवाजा खटखटाने में अनावश्यक देरी नहीं की थी। उच्च न्यायालय ने उच्चतम न्यायालय के फैसले गीता हरिहरन बनाम भारतीय रिजर्व बैंक का उल्लेख करते हुए कहा कि पिता की मृत्यु के बाद मां बच्चे की प्राकृतिक संरक्षक है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कथित समझौते या वसीयत से अधिक महत्वपूर्ण बच्चे का कल्याण है, जो अभिरक्षा के मामलों में सर्वोपरि होता है। पीठ ने यह भी कहा कि बच्चे की दादी के साथ रहने की इच्छा को इस तथ्य से अलग करके नहीं देखा जा सकता कि उसे लंबे समय से मां से मिलने नहीं दिया गया।
अदालत ने पूर्व के न्यायिक फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि कम उम्र के बच्चे हमेशा अभिरक्षा के मामले में अपनी स्वतंत्र और समझदारी भरी पसंद व्यक्त करने में सक्षम नहीं होते। आर्थिक स्थिति पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि दोनों पक्षों की वित्तीय परिस्थितियों में ऐसा कोई असंतुलन नहीं था, जिसके आधार पर मां को बच्चे की अभिरक्षा से वंचित किया जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल कम आय या आर्थिक निर्भरता के आधार पर मां के दावे को खारिज नहीं किया जा सकता। इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पारिवारिक अदालत का फैसला रद्द कर दिया और बच्चे की अभिरक्षा तत्काल उसकी मां को सौंपने का आदेश दिया। साथ ही, दादी को बच्चे से मिलने का अधिकार प्रदान किया। इसके साथ ही मां की अपील स्वीकार कर ली गई।
