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लेखक: संजय अग्रवाल प्रदेश अध्यक्ष, वर्ल्ड हिन्दू फेडरेशन मध्यप्रदेश इंदौर
नेपाल–तिब्बत सीमा पर ग्लेशियर और चट्टान के अचानक ढहने से आई आपदा ने भारी जनहानि पहुंचाई है। वैज्ञानिक इसके तत्काल कारण के रूप में बर्फ और चट्टान के स्खलन को बता रहे हैं, लेकिन इसकी जड़ में जलवायु परिवर्तन की गंभीर समस्या है। हिमालय वैश्विक औसत से लगभग दोगुनी तेजी से गर्म हो रहा है, जिससे ग्लेशियर पतले और अस्थिर हो रहे हैं, तथा घाटियों में बस्तियां नदी के पेट में बसती जा रही हैं।
यह घटना केवल नेपाल तक सीमित नहीं है। गंगा, यमुना, अलकनंदा, मंदाकिनी, सतलज, ब्यास और तीस्ता जैसी प्रमुख नदियां इसी हिमालय से निकलती हैं। केदारनाथ, चमोली और सिक्किम की पूर्ववर्ती घटनाएं इस बात की स्पष्ट चेतावनी दे चुकी हैं। इसलिए, यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि हम हिमालय के साथ कैसा व्यवहार कर रहे हैं।
हमारी सांस्कृतिक परंपराओं में प्रकृति के संरक्षण को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। हिमालय को केवल एक भौगोलिक संरचना नहीं, बल्कि जीवनदायिनी प्रणालियों के आधार स्तंभ के रूप में देखा जाता है। इसकी रक्षा करना पर्यावरण और समाज दोनों के हित में है।
प्रथम जिम्मेदारी: खपत में संयम और कमी
ग्लेशियरों के पिघलने का एक बड़ा कारण अत्यधिक शहरी उपभोग है। बिजली, वाहनों का प्रयोग, सीमेंट, प्लास्टिक और अन्य अनावश्यक सामग्रियों की बढ़ती मांग पर्यावरण पर अतिरिक्त दबाव डालती है।
प्रत्येक नागरिक से यह अपेक्षा है:
बिजली और वातानुकूलन (एसी) का उपयोग संयमित तरीके से करें।
छोटी दूरियां पैदल, साइकिल या सार्वजनिक परिवहन से तय करें और पहाड़ी तीर्थों पर निजी वाहनों की भीड़ को सीमित करें।
स्थानीय और मौسमी खान-पान को अपनाएं, जिससे दूर से आने वाली सामग्रियों का परिवहन बोझ कम हो सके।
प्लास्टिक थैलों और एक बार उपयोग होने वाली बोतलों के प्रयोग से बचें, क्योंकि यह कचरा पहाड़ों में जल निकासी को बाधित करता है।
संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग और खपत में कमी ही प्रकृति के प्रति सच्ची जिम्मेदारी है। जो व्यक्ति कम संसाधनों का उपभोग करता है, वह हिमालय पर कम दबाव डालता है।
द्वितीय जिम्मेदारी: पहाड़ों का संरक्षण
ग्लेशियरों की स्थिरता उनकी ढलानों, जंगलों और चट्टानों की सुरक्षा पर निर्भर करती है। चौड़ी सड़कें, आवश्यकता से अधिक सुरंगें, नदी के किनारे होटल और पेड़ों की अंधाधुंध कटाई पहाड़ों को कमजोर करती है। इससे मलबा नदियों में गिरता है, कृत्रिम झीलें खतरनाक होती हैं और अचानक बाढ़ का खतरा बढ़ता है।
इस दिशा में आवश्यक कदम:
संवेदनशील हिमालयी मार्गों पर अनियंत्रित चौड़ीकरण और भारी निर्माण कार्यों को रोका जाए।
देवदार, बांज और बुरांश जैसे स्थानीय वनों की रक्षा की जाए और उनकी कटाई पर रोक लगे।
अवैध खनन तथा नदियों से अनियोजित रूप से बोल्डर व रेत निकालने की गतिविधियों पर कड़ाई हो।
जलविद्युत और पर्यटन परियोजनाओं को ढलान, ग्लेशियर झील और भूस्खलन के वैज्ञानिक अध्ययन के बिना मंजूरी न दी जाए।
धार्मिक और पर्यटन स्थलों को कंक्रीट के जंगलों में तब्दील होने से बचाया जाए।
विकास आवश्यक है, लेकिन पारिस्थितिकी तंत्र को अपूरणीय क्षति पहुंचाए बिना।
तृतीय जिम्मेदारी: घाटियों को सुरक्षित और खाली रखना
हालिया आपदाओं की सबसे बड़ी सीख यह रही है कि बाढ़ का प्रभाव दूर-दूर तक फैलता है, इसलिए नदी के प्राकृतिक प्रवाह क्षेत्र (फ्लडप्लेन) को खाली रखा जाना चाहिए।
इसके लिए ध्यान रखने योग्य बिंदु:
बाढ़ संभावित क्षेत्रों में नए आवासीय, व्यावसायिक या शैक्षणिक निर्माण न किए जाएं।
पूर्व से जोखिम भरे क्षेत्रों में बसी बस्तियों को योजनाबद्ध तरीके से सुरक्षित और ऊंचे स्थानों पर स्थानांतरित किया जाए।
पुलों को पर्याप्त ऊंचा और मजबूत बनाया जाए ताकि मलबे के साथ आने वाला पानी आसानी से निकल सके।
मजदूर शिविर, ऊर्जा परियोजनाएं और सड़क निर्माण शिविर नदियों के ठीक किनारे स्थापित न किए जाएं।
उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, लद्दाख और जम्मू-कश्मीर की घाटियों को इन चेतावनियों को गंभीरता से लेना होगा।
सरकार, समाज और संस्थाओं की भूमिका
पर्यावरण संरक्षण अकेले नागरिकों के बूते संभव नहीं है। इसके लिए ठोस प्रशासनिक और सामाजिक सहभागिता की आवश्यकता है:
ग्लेशियरों और झीलों की निगरानी प्रणाली को अत्याधुनिक बनाया जाए तथा पूर्व चेतावनी तंत्र को दूरदराज के गांवों तक प्रभावी रूप से पहुंचाया जाए।
पहाड़ी क्षेत्रों में निर्माण के नियमों को कड़ाई से लागू किया जाए और हिमालय को केवल पर्यटन राजस्व का साधन न माना जाए।
मंदिर समितियां और तीर्थ ट्रस्ट प्लास्टिक-मुक्त यात्रा, सीमित वाहनों के प्रयोग और नदियों से उचित दूरी बनाए रखने के अनुशासन का पालन कराएं।
विद्यालयों के पाठ्यक्रम में यह तथ्य शामिल किया जाए कि हिमालय केवल पर्यटन का केंद्र नहीं, बल्कि संपूर्ण उत्तर भारत के जल तंत्र का आधार है।
नेपाल जैसी आपदाओं की पुनरावृत्ति भारत में न हो, इसके लिए खपत घटाना, पहाड़ बचाना और घाटी खाली रखना—ये तीन सूत्र ही सबसे प्रभावी उपाय हैं। प्रकृति के साथ संतुलन और संयम अपनाकर ही हम भविष्य सुरक्षित कर सकते हैं। हिमालय सुरक्षित रहेगा तो नदियां सुरक्षित रहेंगी, और नदियों के संरक्षण से ही यह भू-भाग सुरक्षित रह सकता है।
