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बलौदाबाजार। जिले के लवन थाना क्षेत्र के ग्राम चितावर में 24 वर्षीय शतरूपा ध्रुव की हत्या ने समाज को झकझोर कर रख दिया है। पुलिस के मुताबिक, हत्या के पीछे जादू-टोने को लेकर पैदा हुआ शक वजह बना। इस मामले में शतरूपा के रिश्तेदार और पड़ोसी रामदयाल ध्रुव पर हत्या का आरोप है।
पत्नी की मौत का ठीकरा शतरूपा के परिवार पर
पुलिस के अनुसार, आरोपी की पत्नी की मौत के बाद उसके मन में यह शक घर कर गया था कि शतरूपा की मां ने जादू-टोना किया है। यही शक धीरे-धीरे बदले की भावना में बदल गया। आरोप है कि इसी अंधविश्वास के चलते शतरूपा को निशाना बनाया गया और उसकी जान चली गई। सबसे भयावह बात यह है कि शतरूपा का आरोपी से कोई प्रत्यक्ष व्यक्तिगत विवाद नहीं बताया जा रहा था। बावजूद इसके, किसी दूसरे व्यक्ति के प्रति पैदा हुए शक और अंधविश्वास की कीमत एक 24 वर्षीय युवती को अपनी जिंदगी देकर चुकानी पड़ी।
जब अंधविश्वास बना हत्या की वजह
यह मामला सिर्फ एक हत्या की कहानी नहीं है, बल्कि उस सोच का खतरनाक चेहरा है, जिसमें बीमारी, मौत या परिवार में आने वाली किसी परेशानी का कारण वैज्ञानिक तरीके से तलाशने के बजाय जादू-टोना और टोना-टोटका मान लिया जाता है। अंधविश्वास की यही सोच कई बार किसी महिला को डायन बताने, किसी परिवार को सामाजिक रूप से बहिष्कृत करने और यहां तक कि हिंसा और हत्या तक पहुंच जाती है। डर, अफवाह और बिना प्रमाण के लगाए गए आरोप जब दिमाग पर हावी हो जाते हैं, तो रिश्ते भी दुश्मनी में बदल जाते हैं।
आंकड़े भी डराने वाले
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2022 में जादू-टोने के आरोप से जुड़े मामलों में 85 लोगों की हत्या हुई थी। वर्ष 2021 में यह संख्या 68 थी। वर्ष 2013 से 2022 के बीच ऐसे मामलों में 1,064 लोगों की जान गई। इन घटनाओं में महिलाओं को भी बड़ी संख्या में निशाना बनाया गया।
शतरूपा की मौत छोड़ गई बड़ा सवाल
शतरूपा की हत्या यह सवाल छोड़ गई है कि आखिर कब तक बीमारी, मौत और परेशानियों का जिम्मेदार किसी इंसान को ठहराकर उसके खिलाफ हिंसा की जाएगी? आधुनिक समाज में भी अगर बिना किसी प्रमाण के जादू-टोने का शक किसी की जान ले ले, तो यह सिर्फ कानून-व्यवस्था का मामला नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना पर भी गंभीर सवाल है।
अंधविश्वास के खिलाफ लोगों को जागरूक करने की जरुरत
अंधविश्वास के खिलाफ लड़ाई सिर्फ पुलिस या प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है। परिवार, स्कूल, समाज, सामाजिक संगठन और प्रशासन सभी को मिलकर वैज्ञानिक सोच और जागरूकता को बढ़ावा देना होगा। शतरूपा अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उसकी मौत समाज को एक जरूरी संदेश दे रही है- शक को सच मान लेना खतरनाक है और अंधविश्वास को हिंसा का आधार बनने देना उससे भी ज्यादा खतरनाक।
